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Atharvaveda - Mantra 29

Atharvaveda 18/1/29

4 Sukta
61 Mantra
18/1/29
Devata- त्रिष्टुप् Rishi- यम, मन्त्रोक्त Chhanda- अथर्वा Suktam- पितृमेध सूक्त
Mantra with Swara
द्यावा॑ ह॒क्षामा॑ प्रथ॒मे ऋ॒तेना॑भिश्रा॒वे भ॑वतः सत्य॒वाचा॑। दे॒वो यन्मर्ता॑न्य॒जथा॑यकृ॒ण्वन्त्सीद॒द्धोता॑ प्र॒त्यङ् स्वमसुं॒ यन् ॥

द्यावा॑ । ह॒ । क्षामा॑ । प्र॒थ॒मे इति॑ । ऋ॒तेन॑ । अ॒भि॒ऽश्रा॒वे । भ॒व॒त॒: । स॒त्य॒ऽवाचा॑ । दे॒व: । यत् । मर्ता॑न् । य॒जथा॑य । कृ॒ण्वन् । सीद॑त् । होता॑ । प्र॒त्यङ् । स्वम् । असु॑म् । यन् ॥१.२९॥

Mantra without Swara
द्यावा हक्षामा प्रथमे ऋतेनाभिश्रावे भवतः सत्यवाचा। देवो यन्मर्तान्यजथायकृण्वन्त्सीदद्धोता प्रत्यङ् स्वमसुं यन् ॥

द्यावा । ह । क्षामा । प्रथमे इति । ऋतेन । अभिऽश्रावे । भवत: । सत्यऽवाचा । देव: । यत् । मर्तान् । यजथाय । कृण्वन् । सीदत् । होता । प्रत्यङ् । स्वम् । असुम् । यन् ॥१.२९॥

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1 Bhashyas
Meaning
१. अध्यात्म में (द्यावाक्षामा-) = 'द्युलोक व पृथिवीलोक' का अभिप्राय मस्तिष्क व शरीर है। ये मस्तिष्क और शरीर (ह) = निश्चय से (प्रथमे) = मानव-जीवन में प्रथम स्थान में हैं। मनुष्य का मौलिक कर्तव्य यही है कि वह मस्तिष्क व शरीर को स्वस्थ रखने का प्रयत्न करे। इनका ध्यान न करके रुपया कमाने व यश प्राप्त करने [वाहवाही लूटने] में न लगा रहे। ये मस्तिष्क व शरीर (ऋतेन) = ऋत से प्रत्येक कार्य को ठीक समय पर करने से तथा (सत्यवाचा) = सत्य वाणी से, अर्थात् असत्य को सदा अपने से दूर रखने से (अभिश्रावे भवतः) = सदा अन्दर व बाहर घर में व समाज में प्रशंसनीय होते हैं। ऋत से सब कार्यों को ठीक समय पर करने से शरीर ठीक रहता है। सत्य से मस्तिष्क पवित्र बना रहता है। [सत्यं पुनातु पुनः शिरसि]। २. स्वस्थ शरीर व मस्तिष्कवाले बनकर हम प्रभु के प्रिय होते हैं। वे (देव:) = प्रकाशमय प्रभु (यत्) = जब (मान्) = हम मनुष्यों को (यजथाय) = अपने साथ सम्पर्क के लिए (कृण्वन्) = करते हैं, तब वे प्रभु (प्रत्यङ्सीदत्) = हमारे अन्दर ही हृदयान्तरिक्ष में विराजते हुए होता-हमें सब आवश्यक पदार्थों को देनेवाले होते हुए (स्वम् असम) = अपनी प्राणशक्ति को (यन्) = प्राप्त कराते हैं। प्रभु से प्राणशक्ति व तेज के अंश को प्राप्त करके वे लोग प्रभु-जैसे ही प्रतीत होने लगते हैं। ये अतिमानव प्रतीत होते हैं।
Essence
हम ऋत व सत्य के द्वारा शरीर को दृढ़ व मस्तिष्क को उज्ज्वल बनाएँ। प्रभु के प्रिय बनकर-प्रभुसम्पर्क में आकर अन्दर स्थित प्रभु की शक्ति से शक्तिसम्पन्न हों। यही हमारा मौलिक कर्तव्य है।
Subject
द्यावाक्षामा के लिए सत्य व ऋत का पालन