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Atharvaveda - Mantra 23

Atharvaveda 18/1/23

4 Sukta
61 Mantra
18/1/23
Devata- जगती Rishi- यम, मन्त्रोक्त Chhanda- अथर्वा Suktam- पितृमेध सूक्त
Mantra with Swara
उदी॑रय पि॒तरा॑जा॒र आ भग॒मिय॑क्षति हर्य॒तो हृ॒त्त इ॑ष्यति। विव॑क्ति॒ वह्निः॑ स्वप॒स्यते॑म॒खस्त॑वि॒ष्यते॒ असु॑रो॒ वेप॑ते म॒ती ॥

उत् । ई॒र॒य॒ । पि॒तरा॑ । जाRर: । आ । भग॑म् । इय॑क्षति । ह॒र्य॒त: । हृ॒त्त: । इ॒ष्य॒ति॒ । विव॑क्ति । वह्नि॑: । सु॒ऽअ॒प॒स्यते॑ । म॒ख: । त॒वि॒ष्यते॑ । असु॑र: । वेप॑ते । म॒ती ॥१.२३॥

Mantra without Swara
उदीरय पितराजार आ भगमियक्षति हर्यतो हृत्त इष्यति। विवक्ति वह्निः स्वपस्यतेमखस्तविष्यते असुरो वेपते मती ॥

उत् । ईरय । पितरा । जाRर: । आ । भगम् । इयक्षति । हर्यत: । हृत्त: । इष्यति । विवक्ति । वह्नि: । सुऽअपस्यते । मख: । तविष्यते । असुर: । वेपते । मती ॥१.२३॥

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1 Bhashyas
Meaning
१. (पितरा) = द्यावापृथिवी को-मस्तिष्क व शरीर को (उदीरय) = उत्कृष्ट गति प्राप्त करा। मस्तिष्क व शरीर दोनों को उन्नत कर । द्युलोक मस्तिष्क है और पृथिवीलोक शरीर 'धौ पिता, पृथिवी माता' [मुनों द्यौः पृथिवी शरीरम्।] इसके लिए तू प्रभु का स्तोता बन, क्योंकि (जार:) = प्रभु का स्तोता (भगम्) = भग को-ऐश्वर्य को (आइयक्षति) = सब प्रकार से अपने साथ संगत करता है। उस भगवान् के सम्पर्क में आकर यह उपासक भी भगवाला बनता है। 'समग्न ऐश्वर्य, धर्म, यश, श्री, ज्ञान व वैराग्य' रूप भग को यह प्राप्त करता है। इयत: उस प्रभु की ओर जानेवाला और प्रभु-प्राप्ति की कामनाबाला [हर्य गतिकान्तयोः] यह (हृत्तः) = हृदय से-हृदयस्थ उस प्रभु से (इष्यति) = प्रेरणा प्राप्त करता है। २. बहिः उस प्रेरणा को धारण करनेवाला यह व्यक्ति (विवक्ति) = उस प्रेरणा को अपने जीवन से कहता है, अर्थात् उस प्रेरणा के अनुसार कार्य करता है। इस (स्वपस्यते) [सु अपस] = उत्तम कर्मों को अपनाने की इच्छा करते हुए और इस प्रकार (तविष्यते) = दिव्यगुणों की वृद्धि की इच्छावाले पुरुष के लिए [तु वृद्धी] (मख:) = यह जीवन यज्ञ बन जाता है। (असरः)[अस क्षेपणे] = सब अशुभों को अपने से परे फेंकनेवाला यह (मती) = बुद्धि से (वेपते) = दुरितों को कम्पित करके दूर कर देता है। इसका जीवन पूर्ण पवित्र हो जाता है।
Essence
हम मस्तिष्क व शरीर की उन्नति करें। प्रभु-स्तवन से भगवान के भग को प्राप्त करें। हृदयस्थ प्रभु की वाणी को सुनें। उसके अनुसार कार्य करें। हमारा जीवन यज्ञमय हो जाए। हम बुद्धिपूर्वक कार्यों को करते हुए सब दुरितों को दूर करनेवाले हों।
Subject
जार:-असरः