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Atharvaveda - Mantra 22

Atharvaveda 18/1/22

4 Sukta
61 Mantra
18/1/22
Devata- जगती Rishi- यम, मन्त्रोक्त Chhanda- अथर्वा Suktam- पितृमेध सूक्त
Mantra with Swara
सदा॑सि र॒ण्वोयव॑सेव॒ पुष्य॑ते॒ होत्रा॑भिरग्ने॒ मनु॑षः स्वध्व॒रः। विप्र॑स्य वा॒ यच्छ॑शमा॒नउ॒क्थ्यो॒ वाजं॑ सस॒वाँ उ॑प॒यासि॒ भूरि॑भिः ॥

सदा॑ । अ॒सि॒ । र॒ण्व: । यव॑साऽइव । पुष्य॑ते । होत्रा॑भि: । अ॒ग्ने॒ । मनु॑ष: । सु॒ऽअ॒ध्व॒र: । विप्र॑स्य । वा॒ । यत् । श॒श॒मा॒न: । उ॒क्थ्य᳡: । वाज॑म् । स॒स॒ऽवान् । उ॒प॒ऽयासि॑ । भूरि॑ऽभि: ॥१.२२॥

Mantra without Swara
सदासि रण्वोयवसेव पुष्यते होत्राभिरग्ने मनुषः स्वध्वरः। विप्रस्य वा यच्छशमानउक्थ्यो वाजं ससवाँ उपयासि भूरिभिः ॥

सदा । असि । रण्व: । यवसाऽइव । पुष्यते । होत्राभि: । अग्ने । मनुष: । सुऽअध्वर: । विप्रस्य । वा । यत् । शशमान: । उक्थ्य: । वाजम् । ससऽवान् । उपऽयासि । भूरिऽभि: ॥१.२२॥

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Meaning
१. हे (अग्ने) = अग्रणी प्रभो! आप (सदा रण्वः असि) = सदा रमणीय हो। आप उसी प्रकार सुन्दर हो, (इव) = जैसेकि (पुष्यते) = पुष्ट होनेवाले के लिए (यवसा) = यव आदि तृणधान्य सुन्दर होते हैं, जो किसी प्रकार की हानि न करके मनुष्य को नीरोग-ही-नीरोग बनाते हैं। इसी प्रकार प्रभु का सान्निध्य मनुष्य की अध्यात्म उन्नति के लिए अत्यन्त हितकर है। (होत्राभिः) = दानपूर्वक अदन की क्रियाओं से (मनुषः) = विचारशील पुरुष (स्वध्वरः) = उत्तम हिंसाशून्य कौवाला होता है। २. (यत्) = जब (शशमान:) = प्रभु का स्तवन करता हुआ अथवा द्रुतगतिवाला, अत्यन्त क्रियाशील व्यक्ति (विप्रस्य) = विशेषरूप से अपना पूरण करनेवाले व्यक्ति के (उक्थ: चाजम्) = प्रशंसनीय बल को प्राप्त होता है। (वा) = निश्चय से हे विप्र! तू (ससवान) = [सस्यवान्] वानस्पतिक भोजनों का सेवन करनेवाला बनकर (भूरिभिः) = धारण व पोषण की क्रियाओं से-लोकसंग्रहात्मक कार्यों से (उपयासि) = प्रभु के समीप प्राप्त होता है। प्रभु-प्राप्ति के लिए दो बातें आवश्यक है-[क] वानस्पतिक भोजन को ही अपनाना तथा [ख] अधिक-से-अधिक प्राणियों के हित में प्रवृत्त होना।
Essence
मनुष्य दानपूर्वक अदन करता हुआ जीवन को यज्ञमय बनाता है। प्रभु-स्तवन व क्रियाशीलता को अपनाकर प्रशस्त बल प्राप्त करता है। शाकाहारी व लोकहितकारी बनकर प्रभु को पाता है।
Subject
शाकाहारी-लोकहितकारी