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Atharvaveda - Mantra 20

Atharvaveda 18/1/20

4 Sukta
61 Mantra
18/1/20
Devata- जगती Rishi- यम, मन्त्रोक्त Chhanda- अथर्वा Suktam- पितृमेध सूक्त
Mantra with Swara
सो चि॒न्नुभ॒द्रा क्षु॒मती॒ यश॑स्वत्यु॒षा उ॑वास॒ मन॑वे॒ स्वर्वती।यदी॑मु॒शन्त॑मुश॒तामनु॒ क्रतु॑म॒ग्निं होता॑रं वि॒दथा॑य॒ जीज॑नन् ॥

सो इति॑ । चि॒त् । नु । भ॒द्रा । क्षु॒ऽमती॑ । यश॑स्वती । उ॒षा: । उ॒वा॒स॒ । मन॑वे । स्व᳡:ऽवती । यत् । ई॒म् । उ॒शन्त॑म् । उ॒श॒तम् । अनु॑ । ऋतु॑म् । अ॒ग्निम् । होता॑रम् । वि॒दथा॑य । जीज॑नन् ॥१.२०॥

Mantra without Swara
सो चिन्नुभद्रा क्षुमती यशस्वत्युषा उवास मनवे स्वर्वती।यदीमुशन्तमुशतामनु क्रतुमग्निं होतारं विदथाय जीजनन् ॥

सो इति । चित् । नु । भद्रा । क्षुऽमती । यशस्वती । उषा: । उवास । मनवे । स्व:ऽवती । यत् । ईम् । उशन्तम् । उशतम् । अनु । ऋतुम् । अग्निम् । होतारम् । विदथाय । जीजनन् ॥१.२०॥

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1 Bhashyas
Meaning
१. (सा उचित नु उषा) = और अब वह उषा निश्चय से (मनवे) = समझदार पुरुष के लिए (उवास) = उदित होती है अन्धकार को दूर करती है, जो उषा (भद्रा) = कल्याण व सुख देनेवाली है, (क्षमती) = [क्षु शब्दे] स्तुति के शब्दोंवाली है, जिस उषा में प्रबुद्ध होकर हम प्रभु-स्तवन में प्रवृत्त होते हैं, (यशस्वती) = जो उषा हमारे लिए कीर्तिवाली है। हम उषा में ऐसे ही कर्मों को करें जो हमारी कीर्ति का कारण बनें- स्तवन-स्वाध्याय व यज्ञों' को ही करनेवाले हों। (स्वर्वती) = यह उषा प्रकाशवाली होती है। इस समय स्वाध्याय के द्वारा हम अपने अन्दर प्रकाश को बढ़ानेवाले हों। २, ऐसा उषाकाल हमारे लिए तभी उदित होता है (यत्) = जब हम (ईम्) = निश्चय से (उशन्तम्) = हमारे हित की कामनावाले (उशताम्) = उन्नति की कामनावाले पुरुषों के (अनु क्रतुम्) = संकल्प व पुरुषार्थ के अनुसार (अग्रिम्) = अग्रगति के साधक, (होतारम) = उन्नति के लिए आवश्यक सब पदार्थों को प्राप्त करानेवाले उस प्रभु को (विदथाय) = ज्ञान-प्राप्ति के लिए (जीजनन्) = अपने हृदयों में प्रादूर्भूत करते हैं।
Essence
जब हम अपने हृदयों में उस प्रभु के प्रकाश को देखने का दृढ़ संकल्प तथा पुरुषार्थ करते हैं तभी हम प्रभु को देख पाते हैं। उसी समय हमारे लिए उषाकाल 'भद्र-क्षुमान् यशस्वान् व स्वर्वान होता है।
Subject
'भद्रा' उषा