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Atharvaveda - Mantra 2

Atharvaveda 18/1/2

4 Sukta
61 Mantra
18/1/2
Devata- त्रिष्टुप् Rishi- यम, मन्त्रोक्त Chhanda- अथर्वा Suktam- पितृमेध सूक्त
Mantra with Swara
न ते॒ सखा॑स॒ख्यं व॑ष्ट्ये॒तत्सल॑क्ष्मा॒ यद्विषु॑रूपा॒ भव॑ति। म॒हस्पु॒त्रासो॒ असु॑रस्यवी॒रा दि॒वो ध॒र्तार॑ उर्वि॒या परि॑ ख्यन् ॥

न । ते॒ । सखा॑ । स॒ख्यम् । व॒ष्टि॒ । ए॒तत् । सऽल॑क्ष्मा । य॒त् । विषु॑ऽरूपा । भवा॑ति । म॒ह: । पु॒त्रास॑: । असु॑रस्य । वी॒रा: । दि॒व: । ध॒र्तार॑: । उ॒र्वि॒या । परि॑ । ख्य॒न् ॥१.२॥

Mantra without Swara
न ते सखासख्यं वष्ट्येतत्सलक्ष्मा यद्विषुरूपा भवति। महस्पुत्रासो असुरस्यवीरा दिवो धर्तार उर्विया परि ख्यन् ॥

न । ते । सखा । सख्यम् । वष्टि । एतत् । सऽलक्ष्मा । यत् । विषुऽरूपा । भवाति । मह: । पुत्रास: । असुरस्य । वीरा: । दिव: । धर्तार: । उर्विया । परि । ख्यन् ॥१.२॥

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1 Bhashyas
Meaning
१. यमी को अम कहता है कि सन्तान प्राप्ति के लिए पुरुष और स्त्री का मित्रभाव ठीक ही है, परन्तु (ते सखा) = सहोत्पन्न होने से तेरा मित्र मैं (एतत् सख्यम्) = इस पति-पत्नीरूप मित्रता को (न वष्टि) = नहीं चाहता, (यत्) = चूँकि (सलक्ष्मा) = समान लक्षणोंवाली कन्या, सन्तानोत्पत्ति के लिए (विषुरूपा) = बहुत ही विषम रूपवाली होती है। सन्तानोत्पत्ति के लिए सलक्ष्मत्व हानिकर है। ऐसे सम्बन्धों में सन्तान विरूप व अल्पजीवी उत्पन्न होती है। २. (महस्पुत्रास:) = तेजस्विता के द्वारा अपने को पवित्र व रक्षित करनेवाले [पुनाति त्रायते] (असरस्य वीरा:) = उस प्राणशक्ति के देनेवाले प्रभु के वीर पुत्र [असून् राति] (दिवः धर्तार:) = प्रकाश व ज्ञान का धारण करनेवाले व्यक्ति इस समीप सम्बन्ध का (उर्वियापरिख्यन्) = अत्यन्त ही निषेध करते हैं। समीप सम्बन्धों में [क] सन्तान तेजस्वी नहीं होती, क्योंकि ये सम्बन्ध भोगवृत्ति को प्रधानता देने पर ही होते हैं। [ख] हम उस प्रभु के पुत्र न रहकर प्रकृति के पुत्र बन जाते हैं और सन्तानक्षीण प्राणशक्तिवाले होते हैं। [ग] इन सम्बन्धों के होने पर ज्ञान भी क्षीण हो जाता है।
Essence
समीप-सम्बन्ध विकृत सन्तानों को जन्म देते हैं। इनके कारण सन्तान निस्तेज, विलासमय व क्षीण ज्ञानवाले होते हैं।
Subject
विवाह-सम्बन्ध समीप में नहीं