Available Bhashyas

Bhashyas

Choose the bhashyas to show on this mantra page.

Atharvaveda - Mantra 15

Atharvaveda 18/1/15

4 Sukta
61 Mantra
18/1/15
Devata- आर्षी पङ्क्ति Rishi- यम, मन्त्रोक्त Chhanda- अथर्वा Suktam- पितृमेध सूक्त
Mantra with Swara
ब॒तो ब॑तासि यम॒नैव ते॒ मनो॒ हृद॑यं चाविदा॒म। अ॒न्या किल॒ त्वां क॒क्ष्येव यु॒क्तं परि॑ष्वजातौ॒ लिबु॑जेव वृ॒क्षम् ॥

ब॒त: । ब॒त॒ । अ॒सि॒ । य॒म॒ । न । ए॒व । ते॒ । मन॑: । हृद॑यम् । च॒ । अ॒वि॒दा॒म॒ । अ॒न्या । किल॑ । त्वाम् । क॒क्ष्या᳡ऽइव । यु॒क्तम् । परि॑ । स्व॒जा॒तै॒ । लिबु॑जाऽइव । वृ॒क्षम् ॥१.१५॥

Mantra without Swara
बतो बतासि यमनैव ते मनो हृदयं चाविदाम। अन्या किल त्वां कक्ष्येव युक्तं परिष्वजातौ लिबुजेव वृक्षम् ॥

बत: । बत । असि । यम । न । एव । ते । मन: । हृदयम् । च । अविदाम । अन्या । किल । त्वाम् । कक्ष्याऽइव । युक्तम् । परि । स्वजातै । लिबुजाऽइव । वृक्षम् ॥१.१५॥

Meaning
१. सम्पूर्ण कड़ी परीक्षा में उत्तीर्ण होते हुए अपने भाई को देखकर हृदय में प्रसन्न होती हुई यमी कहती है कि (बतः बत असि) [Joy, Wonder] = अरे भाई! तू तो मेरे हदय को आनन्दित व आश्चर्यित करनेवाला है। मैंने अभी तक (ते मन:) = तेरे मन को (हृदयं च) = व हृदय की गहराई को (न एव अविदाम) = नहीं ही जाना था। आज तेरे मानसभावों व हृदय की पवित्रता को जानकर बड़ी प्रसन्नता, खुशी हुई है। २. यह ठीक ही है कि (अन्या किल) = निश्चय से मुझसे भिन्न [विलक्षण] अर्थात् सुदूर गोत्रवाली ही कोई कन्या (त्वां परिष्यजाते) = तेरा आलिंगन करे। उसीप्रकार आलिंगन करे (इव) = जैसे (लिबुजः) = बेल वृक्ष को आलिंगित करती है, अथवा (इव) = जिस प्रकार (कक्ष्या) = कमर में बाँधी जानेवाली रज्जु (युक्तम्) = अपने से सम्बद्ध घोड़े को आलिंगित करती है। तेरा अपनी पत्नी से सम्बन्ध तुझे शक्तिशाली बनानेवाला हो, उसीप्रकार जैसे कक्ष्या घोड़े को कसी हुई कमरवाला बनाती है और तू पत्नी का उसीप्रकार सहारा हो जैसे कि वृक्ष बेल का।
Essence
सुदूर सम्बन्ध होने पर पत्नी पति की शक्ति व उत्साह-वर्धन का कारण बने और पति पत्नी का आश्रय व वर्धक हो।
Subject
कक्ष्या जैसे युक्त को, बेल जैसे वृक्ष को

We are thankful to https://vedicscriptures.in for providing us a substantial amount of data for this section of the Vedas.