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Atharvaveda - Mantra 12

Atharvaveda 18/1/12

4 Sukta
61 Mantra
18/1/12
Devata- त्रिष्टुप् Rishi- यम, मन्त्रोक्त Chhanda- अथर्वा Suktam- पितृमेध सूक्त
Mantra with Swara
किंभ्राता॑स॒द्यद॑ना॒थं भवा॑ति॒ किमु॒ स्वसा॒ यन्निरृ॑तिर्नि॒गच्छा॑त्। काम॑मूताब॒ह्वे॒तद्र॑पामि त॒न्वा॑ मे त॒न्वं सं पि॑पृग्धि ॥

किम् । भ्राता॑ । अ॒स॒त् । यत् । अ॒ना॒थम् । भवा॑ति । किम् । ऊं॒ इति॑ । स्वसा॑ । यत् । नि:ऽऋ॑ति: । नि॒ऽगच्छा॑त् । काम॑ऽमूता । ब॒हू । ए॒तत् । र॒पा॒मि॒ । त॒न्वा᳡ । मे॒ । त॒न्व᳡म् । सम् । पि॒पृ॒ग्धि॒ ॥१.१२॥

Mantra without Swara
किंभ्रातासद्यदनाथं भवाति किमु स्वसा यन्निरृतिर्निगच्छात्। काममूताबह्वेतद्रपामि तन्वा मे तन्वं सं पिपृग्धि ॥

किम् । भ्राता । असत् । यत् । अनाथम् । भवाति । किम् । ऊं इति । स्वसा । यत् । नि:ऽऋति: । निऽगच्छात् । कामऽमूता । बहू । एतत् । रपामि । तन्वा । मे । तन्वम् । सम् । पिपृग्धि ॥१.१२॥

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Meaning
१. यमी परीक्षा लेती हुई कहती है कि (यत) = यदि (अनाथं भवाति) = बहिन अनाथ-रक्षक से रहित होती है तो (किं भ्राता असत्) = वह भाई कुत्सित होता है। भाई को तो बहिन का सदा रक्षक होना चाहिए, (उ) = और (यत्) = यदि भाई को (निर्ऋति:) = दुर्गति व कष्ट (निगच्छात्) = प्राप्त होता है तो वह (किं स्वसा) = कुत्सित ही तो बहिन है, अर्थात् हे यम! तू सदा मेरा रक्षक बन और मैं तुझे सदा सुख पहुँचानेवाली बनें। ऐसा ही हमारा सम्बन्ध बना रहे। २. काम-मता [मव बन्धने]-प्रेमभाव से बद्ध हुई-हुई (एतत्) = यह बात (बहुरपामि) = फिर-फिर मैं कहती हूँ। तू में (तन्वा) = मेरे शरीर से (तन्वम्) = अपने शरीर को (संपिग्धि) = सम्यक् संपृक्त करनेवाला हो। इसप्रकार हम दो होते हुए भी एक हो जाएँ।
Essence
पति पत्नी का रक्षण करता है। पत्नी पति को सुस्थिति प्राप्त कराती है। परस्पर प्रेमभाव से युक्त होकर वे एक-दूसरे की न्यूनताओं को दूर करनेवाले होते हैं। पति पत्नी वस्तुत: एक दूसरे के पूरक हैं।
Subject
संरक्षण व सुस्थिति