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Atharvaveda - Mantra 1

Atharvaveda 18/1/1

4 Sukta
61 Mantra
18/1/1
Devata- त्रिष्टुप् Rishi- यम, मन्त्रोक्त Chhanda- अथर्वा Suktam- पितृमेध सूक्त
Mantra with Swara
ओ चि॒त्सखा॑यंस॒ख्या व॑वृत्यां ति॒रः पु॒रु चि॑दर्ण॒वं ज॑ग॒न्वान्। पि॒तुर्नपा॑त॒मा द॑धीतवे॒धा अधि॒ क्षमि॑ प्रत॒रं दीध्या॑नः ॥

ओ इति॑ । चि॒त् । सखा॑यम् । स॒ख्या । व॒वृ॒त्या॒म् । ति॒र: । पु॒रु । चि॒त् । अ॒र्ण॒वम् । ज॒ग॒न्वान् । पि॒तु: । नपा॑तम् । आ । द॒धी॒त॒ । वे॒धा: । अधि॑ । क्षमि॑ । प्र॒ऽत॒रम् । दीध्या॑न: ॥१.१॥

Mantra without Swara
ओ चित्सखायंसख्या ववृत्यां तिरः पुरु चिदर्णवं जगन्वान्। पितुर्नपातमा दधीतवेधा अधि क्षमि प्रतरं दीध्यानः ॥

ओ इति । चित् । सखायम् । सख्या । ववृत्याम् । तिर: । पुरु । चित् । अर्णवम् । जगन्वान् । पितु: । नपातम् । आ । दधीत । वेधा: । अधि । क्षमि । प्रऽतरम् । दीध्यान: ॥१.१॥

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1 Bhashyas
Meaning
१. यमी यम से कहती है कि (ओचित्) = निश्चय से (सखायम्) = मित्रभूत तुझको (सख्या) = मित्रभाव से (आववृत्याम्) = आवृत्त करती हूँ। 'सखे सप्तपदी भव' इस सातवें पग के वाक्य के अनुसार पति-पत्नी इस संसार-समुद्र में एक-दूसरे के सखा तो हैं ही, इसलिए मैं तुझे पतिरूप से चाहती हूँ कि (पुरूचित्) = इस अत्यन्त विस्तृत (अर्णवम्) = संसार-समुद्र को (जगन्वान्) = गया हुआ पुरुष (तिर:) = अन्तर्हित हो जाता है। मनुष्य मृत्यु का शिकार होकर संसार-समुद्र में लीन हो जाता है। २. इस बात का ध्यान करके ही (प्रतरं दीध्यान:) = इस विस्तृत समुद्र का विचार करता हुआ (वेधा:) = बुद्धिमान् पुरुष (अधिक्षमिः) = इस पृथ्वी पर (पितुः नपातमा) = पिता के न नष्ट होने देनेवाले सन्तान को (आदधीत) = आहित करता है। इसप्रकार इस नश्वर शरीर के नष्ट हो जाने पर भी उस सन्तान के रूप में बना ही रहता है। यमी का युक्तिक्रम यह है कि [क] इस विशाल संसार-समुद्र में मनुष्य कुछ देर बाद तिरोहित हो जाता है। [ख] सन्तानन के रूप में ही उसका चिह बना रहता है, [ग] अत: सन्तान-प्राप्ति के लिए तू मुझे पत्नी रूप में चाहनेवाला हो।
Essence
इस विशाल संसार-समुद्र में मनुष्य सन्तान के रूप में ही बना रहता है, अत: सन्तान-प्राप्ति के लिए 'यम' यमी' की कामना करे। 'यम-यमी' शब्द के प्रयोग से स्पष्ट है कि पति-पत्नी संयत जीवनवाले हों।
Subject
सन्तान क्यों?