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Atharvaveda - Mantra 6

Atharvaveda 17/1/6

1 Sukta
30 Mantra
17/1/6
Devata- त्र्यवसाना सप्तदात्यष्टि Rishi- आदित्य Chhanda- ब्रह्मा Suktam- अभ्युदयार्थप्रार्थना सूक्त
Mantra with Swara
उदि॒ह्युदि॑हिसूर्य॒ वर्च॑सा मा॒भ्युदि॑हि। द्वि॒षंश्च॒ मह्यं॒ रध्य॑तु॒ मा चा॒हं द्वि॑ष॒तेर॑धं॒ तवेद्वि॑ष्णो बहु॒धा वी॒र्याणि। त्वं नः॑ पृणीहि प॒शुभि॑र्वि॒श्वरू॑पैःसु॒धायां॑ मा धेहि पर॒मे व्योमन् ॥

उत् । इ॒हि॒ । उत् । इ॒हि॒ । सू॒र्य॒ । वर्च॑सा । मा॒ । अ॒भि॒ऽउदि॑हि । द्वि॒षन् । च॒ । मह्य॑म् । रध्य॑तु । मा । च॒ । अ॒हम् । द्वि॒ष॒ते । र॒ध॒म् । तव॑ । इत् । वि॒ष्णो॒ इति॑ । ब॒हु॒ऽधा । वी॒र्या᳡ण‍ि । त्वम् । न॒: । पृ॒णी॒हि॒ । प॒शुऽभि॑: । वि॒श्वऽरू॑पै: । सु॒ऽधाया॑म् । मा॒ । धे॒हि॒ । प॒र॒मे । विऽओ॑मन् ॥१.६॥

Mantra without Swara
उदिह्युदिहिसूर्य वर्चसा माभ्युदिहि। द्विषंश्च मह्यं रध्यतु मा चाहं द्विषतेरधं तवेद्विष्णो बहुधा वीर्याणि। त्वं नः पृणीहि पशुभिर्विश्वरूपैःसुधायां मा धेहि परमे व्योमन् ॥

उत् । इहि । उत् । इहि । सूर्य । वर्चसा । मा । अभिऽउदिहि । द्विषन् । च । मह्यम् । रध्यतु । मा । च । अहम् । द्विषते । रधम् । तव । इत् । विष्णो इति । बहुऽधा । वीर्याण‍ि । त्वम् । न: । पृणीहि । पशुऽभि: । विश्वऽरूपै: । सुऽधायाम् । मा । धेहि । परमे । विऽओमन् ॥१.६॥

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1 Bhashyas
Meaning
१. हे (सूर्य) = [सरते: सुवते] सबको गति देनेवाले व सबको प्रेरणा देनेवाले प्रभो! (उदिहि) = आप हमारे हृदयाकाश में उदित होइए। हम हृदयों में आपके प्रकाश को देखें। (वर्चसा मा अभ्युदिहि उदिहि) = वर्चस के हेतु से आप मेरी ओर उदित होइए। हृदय में आपका प्रादुर्भाव मुझे वर्चस्वी बनाएगा (च) = और आपके प्रादुर्भाव से (द्विषन्) = द्वेष करता हुआ शत्रु (मह्यं रथ्यतु) = मेरे लिए वशीभूत हो जाए (च) = और (अहम्) = मैं (द्विषते मा रधम्) = वैर करनेवाले के वश में न हो जाऊँ। २. हे (विष्णो) = सर्वव्यापक प्रभो। (तव इत्) = आपके ही ये (बहुधा वीर्याणि) = नानाप्रकार के पराक्रम हैं। ब्रह्माण्ड में सूर्य आदि पिण्डों के निर्माण व धारणरूप एवं शक्तिशाली कर्म आपके ही हैं। हे प्रभो! (त्वम्) = आप (नः) = हमें (विश्वरूपैः पशुभिः) = इन नानारूपवाले पशुओं से (पृणीहि) = पूरित कीजिए। गवादि पशु दूध आदि देकर हमारे पालन का साधन बनें। हे प्रभो। आप (मा) = मुझे (सुधायाम्) = [सुधा] उत्तम भरण-पोषण करनेवाली अमृतरूप शक्ति में तथा (परमे व्योमन्) = उत्कृष्ट [विशेषेण अवति] रक्षण-स्थान में-हृदयाकाश में (धेहि) = स्थापित कीजिए। मैं मन को इधर उधर भटकने देने की अपेक्षा हृदय में मन को निरुद्ध करूँ।
Essence
मेरे हृदय में प्रभु के प्रकाश का प्रादुर्भाव हो। मैं शत्रुओं को वशीभूत करनेवाला बनूं। ब्रह्माण्ड में सर्वत्र प्रभु के शक्तिशाली कर्मों को देखू । प्रभु मुझे आत्मधारण शक्ति दें तथा मन को हृदयाकाश में सन्निरुद्ध कर सकने का सामर्थ्य दें।


७-प्रभुरूप सूर्य मेरे हृदयाकाश में उदित हों। मुझे वर्चस्वी बनाने के लिए वे मुझे प्राप्त हों। हे प्रभो! आप (यान् च पश्यामि) = जिन मनुष्यों को मैं देखता हूँ (च) = और (यान् न) = जिनको नहीं देखता, (तेषु) = उन सबमें (मा) = मुझे (सुमतिम्) = कल्याणी मतिवाला (कृधि) = कीजिए। मैं सबके कल्याण का ही चिन्तन करूँ-किसी के अशुभ को सोचनेवाला न बनें। २.हे प्रभो! आपके अनेक शक्तिशाली कर्म हैं। शेष पूर्ववत्।

भावार्थ-प्रभु के प्रकाश को देखता हुआ, प्रभु के वर्चस् को प्रास करता हुआ मैं सबके प्रति सुमतिवाला बनूं। प्रभु के अनन्त पराक्रम हैं। वे हमें गवादि पशुओं द्वारा दूध आदि पदार्थों को प्राप्त करके पालित करते हैं। वे हमें 'सुधा व परमव्योम' में स्थापित करते हैं।
Subject
सुधा व परम व्योम में धारण