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Atharvaveda - Mantra 3

Atharvaveda 17/1/3

1 Sukta
30 Mantra
17/1/3
Devata- त्र्यवसाना षट्पदा अति जगती Rishi- आदित्य Chhanda- ब्रह्मा Suktam- अभ्युदयार्थप्रार्थना सूक्त
Mantra with Swara
वि॑षास॒हिंसह॑मानं सासहा॒नं सही॑यांसम्। सह॑मानं सहो॒जितं॑ स्व॒र्जितं॑ गो॒जितं॑संधना॒जित॑म्। ईड्यं॒ नाम॑ ह्व॒ इन्द्रं॑ प्रि॒यः प्र॒जानां॑ भूयासम् ॥

वि॒ऽस॒स॒हिम् । सह॑मानम् । स॒स॒हा॒नम् । सही॑यांसम् । सह॑मानम् । स॒ह॒:ऽजित॑म् । स्व॒:ऽजित॑म्। गो॒ऽजित॑म् । सं॒ध॒न॒ऽजित॑म् । ईड्य॑म् । नाम॑ । ह्वे॒ । इन्द्र॑म् । प्रि॒य: । प्र॒ऽजाना॑म् । भू॒या॒स॒म् ॥१.३॥

Mantra without Swara
विषासहिंसहमानं सासहानं सहीयांसम्। सहमानं सहोजितं स्वर्जितं गोजितंसंधनाजितम्। ईड्यं नाम ह्व इन्द्रं प्रियः प्रजानां भूयासम् ॥

विऽससहिम् । सहमानम् । ससहानम् । सहीयांसम् । सहमानम् । सह:ऽजितम् । स्व:ऽजितम्। गोऽजितम् । संधनऽजितम् । ईड्यम् । नाम । ह्वे । इन्द्रम् । प्रिय: । प्रऽजानाम् । भूयासम् ॥१.३॥

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1 Bhashyas
Meaning
१. मैं (ईड्यं नाम) = प्रशंसनीय [स्तुत्य] यशवाले (इन्द्रम्) = शत्रु-विद्रावक प्रभु को (ह्वे) = पुकारता हूँ। उन प्रभु को पुकारता हूँ जो (विषासहि) = शत्रुओं का अत्यधिक पराभव करनेवाले हैं। (सहमानम्) = शत्रुओं को कुचल देनेवाले हैं। (सासहानम्) = निरन्तर शत्रुओं का विनाश कर रहे हैं। (सहीयांसम्) = शत्रुमर्षकों में श्रेष्ठ हैं। उन प्रभु को मैं पुकारता हूँ जो (सहमानम्) = [be able to resist] मेरे अन्दर उत्पन्न होनेवाले-मुझपर आक्रमण करनेवाले सब प्रलोभनों को रोकने में समर्थ हैं। (सहोजितम्) = मेरे लिए शत्रुपराभवधारी बल का विजय करनेवाले हैं-मुझे 'सहस्' प्रास करानेवाले हैं। केवल 'सहस्' ही नहीं (स्वर्जितम्) = प्रलोभनों के निराकरण के द्वारा (स्व:) = आत्मप्रकाश को प्राप्त करानेवाले हैं। (गोजितं) = मेरे लिए ज्ञान की वाणियों का विजय करनेवाले, इन्हें मुझे प्राप्त करानेवाले हैं और (सन्धनाजितम्) = प्रशस्त धनों का मेरे लिए विजय करनेवाले हैं। २. इसप्रकार बल '[सहस] को, आत्मप्रकाश [स्वः] को, गौओं को [ज्ञानवाणियों को] व धनों को प्राप्त करके (आयुष्मान् भूयासम्) = मैं प्रशस्त आयु-[जीवन]-वाला बनूं। प्रशंसनीय जीवन वही है जिसमें भौतिक आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए धनों की कमी नहीं, जो जीवन जानमय है, जिसमें आत्मप्रकाश को प्राप्त करने की रुचि है और सहस् [बल] है, शत्रुमर्षक बल है। ३. ऐसा बनकर मैं (देवानां प्रियः भूयासम्) = देवों का प्रिय बनें। माता, पिता, आचार्य व विद्वान् अतिथि और अन्ततः प्रभु का भी मैं प्रिय बनें। ये सब देव मुझे प्रशस्त जीवन के बनाने में सहायक हों। ४. इसप्रकार का बनकर (प्रियः प्रजानां भूयासम्) = मैं प्रजाओं का भी प्रिय बनें। सब लोग मुझे देखकर प्रसन्न हों। मेरा कोई भी कार्य किसी के अहित का कारण न बने। (पशूनां प्रियः भूयासम्) = पशुओं का भी मैं प्रिय बनूं। गौ आदि का तो घर पर पालन करूँ ही, परन्तु इसके साथ ही इसप्रकार अहिंसा की साधना करूँ कि 'अहिंसा प्रतिष्ठायां तत्सन्निधौ वैरत्यागः।' इस योगसूत्र के अनुसार मेरे समीप शेर आदि भी वैरत्याग करके आसीन हों। ५. मेरा व्यवहार इतना सुन्दर व अभिमानशून्य हो कि मैं (समानानां प्रियः भूयासम्) = अपने समबर्ग के लोगों का भी प्रिय बनूँ। अपने उत्थान का अभिमान न कसैं और किसी की निन्दा में कभी प्रवृत्त न होऊँ। प्रभु-स्मरण करता हुआ अभिमान आदि दुर्गुणों से दूर रहूँ।
Essence
प्रभु का 'विषासहि, सहमान, सासहान, सहीयान् व सहमान' इन पाँच शब्दों से स्मरण करता हुआ मैं पाँचों कोशों के शत्रुओं का पराभव करूँ। शत्रुपराभव द्वारा 'बल, आत्मप्रकाश, ज्ञान व धन' का विजय करके मैं प्रशस्त जीवनवाला बनूं। इस प्रशस्त जीवन में मैं 'देवों का, प्रजाओं का, पशुओं का व अपने समवर्गवालों का' प्रिय बनें।
Subject
प्रशस्ततम जीवन