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Atharvaveda - Mantra 29

Atharvaveda 17/1/29

1 Sukta
30 Mantra
17/1/29
Devata- त्रिष्टुप् Rishi- आदित्य Chhanda- ब्रह्मा Suktam- अभ्युदयार्थप्रार्थना सूक्त
Mantra with Swara
ऋ॒तेन॑ गु॒प्तऋ॒तुभि॑श्च॒ सर्वै॑र्भू॒तेन॑ गु॒प्तो भव्ये॑न चा॒हम्। मा मा॒ प्राप॑त्पा॒प्मामोत मृ॒त्युर॒न्तर्द॑धे॒ऽहं स॑लि॒लेन॑ वा॒चः ॥

ऋ॒तेन॑ । गु॒प्त: । ऋ॒तुऽभि॑: । च॒ । सर्वै॑: । भू॒तेन॑ । गु॒प्त: । भव्ये॑न । च॒ । अ॒हम् । मा । मा॒ । प्र । आ॒प॒त् । पा॒प्मा । मा । उ॒त । मृ॒त्यु: । अ॒न्त: । द॒धे॒ । अ॒हम् । स॒लि॒लेन॑ । वा॒च: ॥१.२९॥

Mantra without Swara
ऋतेन गुप्तऋतुभिश्च सर्वैर्भूतेन गुप्तो भव्येन चाहम्। मा मा प्रापत्पाप्मामोत मृत्युरन्तर्दधेऽहं सलिलेन वाचः ॥

ऋतेन । गुप्त: । ऋतुऽभि: । च । सर्वै: । भूतेन । गुप्त: । भव्येन । च । अहम् । मा । मा । प्र । आपत् । पाप्मा । मा । उत । मृत्यु: । अन्त: । दधे । अहम् । सलिलेन । वाच: ॥१.२९॥

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1 Bhashyas
Meaning
१. (अहम्) = मैं तेन गुप्तः ऋत के द्वारा नियमित क्रियाओं के द्वारा रक्षित किया गया हूँ (च) = और (सर्वैः तुभिः) = सब ऋतुओं से रक्षित हुआ हूँ। ऋतुचर्या के ठीक पालन के कारण स्वस्थ बना हूँ। (भूतेन भव्येन च गुप्त:) = उपादानकारणभूत 'पृथिवी, जल, तेज, वायु व आकाश' रूप पञ्चभूतों से तथा इन भूतों से उत्पन्न शरीर आदि से मैं (गुप्त:) = सुरक्षित हुआ हूँ। इन भूतों के साथ उचित सम्पर्क से स्वाभाविक जीवन बिताने से मैं स्वस्थ बना दूँ। २. (मा) = मुझे पाप्मा पाप (मा प्रापत्) = मत प्राप्त हो। उत और (मृत्युः मा) = मृत्यु भी मत प्राप्त हो। पाप का परिणाम ही मृत्यु होती है। (अहम्) = मैं (वाच:) = ज्ञान की बाणियों के (सलिलेन) = जल से (अन्तर्दधे) = अपने को अन्तर्हित करता हूँ। इनसे अन्तर्हित होने पर मुझ तक पाप व मृत्यु का पहुँचना नहीं हो पाता। जैसे जल से भरी खाई [परिखा] शत्रु को किले की दीवार तक नहीं आने देती, इसीप्रकार ज्ञानजल से अन्तर्हित मुझ तक ये पाप व मृत्यु नहीं पहुँच पाते।
Essence
मेरा जीवन नियमित हो। ऋतुचर्या का मैं ठीक से पालन करूँ। पृथिवी आदि पञ्चभूतों व तज्जन्य सूर्य आदि से मेरा समुचित सम्पर्क हो। साथ ही ज्ञान के जल से मैं अपने को सदा पवित्र बनाऊँ। इसप्रकार पाप व मृत्यु से मैं बचा रहूँ।
Subject
पाप व मृत्यु से दूर