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Atharvaveda - Mantra 5

Atharvaveda 16/6/5

9 Sukta
11 Mantra
16/6/5
Devata- साम्नी पङ्क्ति Rishi- उषा,दुःस्वप्ननासन Chhanda- यम Suktam- दुःख मोचन सूक्त
Mantra with Swara
उ॒षा दे॒वी वा॒चासं॑विदा॒ना वाग्दे॒व्युषसा॑ संविदा॒ना ॥

उ॒षा: । दे॒वी । वा॒चा । स॒म्ऽवि॒दा॒ना । वाक् । दे॒वी । उषसा॑ । स॒म्ऽवि॒दा॒ना ॥६.५॥

Mantra without Swara
उषा देवी वाचासंविदाना वाग्देव्युषसा संविदाना ॥

उषा: । देवी । वाचा । सम्ऽविदाना । वाक् । देवी । उषसा । सम्ऽविदाना ॥६.५॥

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1 Bhashyas
Meaning
१. 'हमारे जीवनों में गतमन्त्र में वर्णित सर्वाप्रियता न उत्पन्न हो जाए' इसके लिए हम प्रयत्न करें कि (उषा: देवी) = अन्धकार को दूर करनेवाली यह उषा (वाचा संविदाना) = स्तुति व ज्ञान की बाणियों के साथ मेलवाली हो-ऐकमत्यवाली हो, अर्थात् उषा में जागरित होकर हम प्रभु-स्तवनपूर्वक स्वाध्याय में प्रवृत्त हों। हमारी यह (वाग् देवी) = दिव्य गुणयुक्त वाणी (उषसा संविदाना) = उषा के साथ मेलवाली हो। उषाकाल में हम स्तोत्रों व ज्ञानवाणियों का ही उच्चारण करनेवाले बनें। २. प्रातः प्रबुद्ध होनेवाला व्यक्ति 'उषस्पति' है और ज्ञान की वाणियों का स्वामी बननेवाला व्यक्ति वाचस्पति' है। (उषस्पतिः वाचस्पतिना संविदान:) = उषस्पति वाचस्पति के साथ मेलवाला हो और (वाचस्पतिः उषस्पतिना संविदान:) = वाचस्पति उषस्पति के साथ मेलवाला हो, अर्थात एक व्यक्ति केवल उषस्पति व केवल वाचस्पति ही न बने, वह 'उपस्पति और वाचस्पति' दोनों बनने का प्रयत्न करे । वह प्रातः जागरणशील भी हो और प्रात: प्रबुद्ध होकर प्रभु-स्तवनपूर्वक स्वाध्याय में प्रवृत्त हो।
Essence
हमारे जीवनों में 'उषा व वाक्' का मेल हो। हम 'उषस्पति व वाचस्पति' दोनों बनने का प्रयत्न करें। हमारे जीवनों में प्रात:जागरण के साथ प्रभु-स्तवन व स्वाध्याय जुड़े हुए हों।
Subject
उषा+वाक्, उषस्पति+वाचस्पति