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Atharvaveda - Mantra 10

Atharvaveda 16/6/10

9 Sukta
11 Mantra
16/6/10
Devata- आर्ची उष्णिक् Rishi- उषा,दुःस्वप्ननासन Chhanda- यम Suktam- दुःख मोचन सूक्त
Mantra with Swara
अना॑गमिष्यतो॒वरा॒नवि॑त्तेः संक॒ल्पानमु॑च्या द्रु॒हः पाशा॑न् ॥

अना॑गमिष्यत: । वरा॑न् । अवि॑त्ते: । स॒म्ऽक॒ल्पान् । अमु॑च्या: । द्रु॒ह: । पाशा॑न् ॥६.१०॥

Mantra without Swara
अनागमिष्यतोवरानवित्तेः संकल्पानमुच्या द्रुहः पाशान् ॥

अनागमिष्यत: । वरान् । अवित्ते: । सम्ऽकल्पान् । अमुच्या: । द्रुह: । पाशान् ॥६.१०॥

Meaning
१. हे प्रभु के उपासक! तु (अनागमिष्यत:) = उन सब उत्तम पदार्थों को जो आते प्रतीत नहीं होते (अमुच्या:) = छोड़नेवाला बन। प्रयत्न में तो कमी नहीं करना, परन्तु व्यर्थ की आशाएँ नहीं लगाए रखना। 'ये तो मिल गया है, ये भी मिल जाएगा' इस प्रकार नहीं सोचते रहना। २. साथ ही (अवित्ते: संकल्पान्) = अनैश्वर्य के संकल्पों को भी तू छोड़नेवाला हो । निर्धनता के आ जाने की आकांक्षाओं से डरते न रहना। (द्रुहः पाशान्) = द्रोह की भावना के पाशों को भी तू छोड़। किसी के विषय में द्रोह की भावना को अपने हृदय में स्थान न देना।
Essence
प्रभु का उपासक भविष्य की उज्ज्वल कल्पनाओं में नहीं उड़ता रहता। निर्धनता के आ जाने के भय से घबराया नहीं रहता और कभी भी द्रोह की भावना से युक्त नहीं होता।
Subject
उपासक की तीन बातें

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