Available Bhashyas

Bhashyas

Choose the bhashyas to show on this mantra page.

Atharvaveda - Mantra 7

Atharvaveda 16/4/7

9 Sukta
7 Mantra
16/4/7
Devata- त्रिपदा विराण्नाम गायत्री Rishi- आदित्य Chhanda- ब्रह्मा Suktam- दुःख मोचन सूक्त
Mantra with Swara
शक्व॑री स्थप॒शवो॒ मोप॑ स्थेषुर्मि॒त्रावरु॑णौ मे प्राणापा॒नाव॒ग्निर्मे॒ दक्षं॑ दधातु॥

शक्व॑री: । स्थ॒ । प॒शव॑: । मा॒ । उप॑ । स्थे॒षु॒: । मि॒त्रावरु॑णौ । मे॒ । प्रा॒णा॒पा॒नौ । अ॒ग्नि: । मे॒ । दक्ष॑म् । द॒धा॒तु॒ ॥४.७॥

Mantra without Swara
शक्वरी स्थपशवो मोप स्थेषुर्मित्रावरुणौ मे प्राणापानावग्निर्मे दक्षं दधातु॥

शक्वरी: । स्थ । पशव: । मा । उप । स्थेषु: । मित्रावरुणौ । मे । प्राणापानौ । अग्नि: । मे । दक्षम् । दधातु ॥४.७॥

Available Bhashyas

1 Bhashyas
Meaning
१. गतमन्त्र से'आप:' का यहाँ भी अनुवर्तन है। हे (आपः) [शरीरस्थ रेत:कणो]! (शक्वरी स्थ) = तुम शरीर को शक्तिशाली बनानेवाले हो। इन रेत:कणों के रक्षण से (पशवः) [प्राणः पशव: शत० ७.५.२.६]-(प्राण मा उपस्थेषुः) = मुझे प्राप्त हों। रेतःकणों का रक्षण मेरे प्राणापान को सबल बनाए। २. ये (प्राणपानौ) = प्राण और अपान मे मित्रावरुणौ मुझे पापों व मृत्यु से बचानेवाले [प्रमीतेः त्रयते] तथा मुझे द्वेषशुन्य बनानेवाले [वारयति] है। प्राणसाधना के होने पर शरीर नीरोग बनता है तथा मन निष्याप व निर्दोष होता है। ३. इन रेत:कणों का रक्षण होने पर (अग्निः) = शरीर में उचित मात्रा में विकसित हुआ-हुआ अग्नितत्व में (दक्षं दधातु) = मुझमें बल का धारण करे ।
Essence
प्राणसाधना द्वारा शरीर में रेत:कणों का रक्षण होता है। इसप्रकार ये प्राणापान हमें 'नीरोग, निष, निष्पाप व शक्तिशाली' बनाते हैं।
प्राणसाधना द्वारा हम इन्द्रियों का संयम करनेवाले 'यम' बनते हैं। अगले सब सूक्तों का [५ से ९ तक] ऋषि 'यम' ही है
Subject
मित्रावरुणौ-दक्षम्