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Atharvaveda - Mantra 2

Atharvaveda 16/4/2

9 Sukta
7 Mantra
16/4/2
Devata- साम्नी उष्णिक् Rishi- आदित्य Chhanda- ब्रह्मा Suktam- दुःख मोचन सूक्त
Mantra with Swara
स्वा॒सद॑सि सू॒षाअ॒मृतो॒ मर्त्ये॒श्वा ॥

सु॒ऽआ॒सत् । अ॒सि॒ । सु॒ऽउ॒षा : । अ॒मृत॑: । मर्त्ये॑षु । आ ॥४.२॥

Mantra without Swara
स्वासदसि सूषाअमृतो मर्त्येश्वा ॥

सुऽआसत् । असि । सुऽउषा : । अमृत: । मर्त्येषु । आ ॥४.२॥

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Meaning
१. (स्वासत् असि) [स्व आ सत] = तु सब ओर से इन्द्रिय-वृत्तियों को प्रत्याहृत करके अपने में आसीन होनेवाला है। प्रतिदिन ध्यान में स्थित होकर आत्मनिरीक्षण करने की प्रवृत्तिवाला है और इसलिए (सूषा:) = [सु उष्] दोर्षों को सम्यक् दग्ध करनेवाला है [उष दाहे]। दोषों को दग्ध करके तू (मत्येषु) = मरणधर्मा पुरुषों में (अमृतः) = अमृत बना है। न तो तू विषयों के पीछे मारा मारा फिरता है [अ मृत] और न ही तू रोगों का शिकार होता है [एकशतं मृत्यवः] । संसार में फैले हुए सैकड़ों रोगों का तू शिकार नहीं होता।
Essence
हम प्रतिदिन अपने अन्दर आसीन होनेवाले हों-आत्मनिरीक्षण करें और दोषों को दग्ध करके अमृत बनें।
Subject
सूषा