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Atharvaveda - Mantra 7

Atharvaveda 16/1/7

9 Sukta
13 Mantra
16/1/7
Devata- निचृत विराट् गायत्री Rishi- प्रजापति Chhanda- अथर्वा Suktam- दुःख मोचन सूक्त
Mantra with Swara
यो॒प्स्वग्निरति॒ तं सृ॑जामि म्रो॒कं ख॒निं त॑नू॒दूषि॑म् ॥

य: । अ॒प्ऽसु । अ॒ग्नि: । अति॑ । तम् । सृ॒जा॒मि॒ । म्रो॒कम् । ख॒निम् । त॒नू॒ऽदूषि॑म् ॥१.७॥

Mantra without Swara
योप्स्वग्निरति तं सृजामि म्रोकं खनिं तनूदूषिम् ॥

य: । अप्ऽसु । अग्नि: । अति । तम् । सृजामि । म्रोकम् । खनिम् । तनूऽदूषिम् ॥१.७॥

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1 Bhashyas
Meaning
१. (य:) = जो (अप्सु) = [आपो नारा इति प्रोक्ताः] प्रजाओं में यह (अग्नि:) = कामाग्नि उत्पन्न हो जाता है। यह 'मनसि-ज' है-भौतिक सौन्दर्य को देखकर मन में उत्पन्न हो ही जाता है। (तम् अति सृजामि) उसको मैं कर्मों में व ज्ञान-प्राप्ति में लगे रहकर सुदूर परित्यक्त करता हूँ। २. उस कामाग्नि को दूर करता है जोकि (म्रोकम्) = जीवन को बड़ा अशान्त बनाता है। (खनिम्) = शक्तियों का अवदारण कर देता है तथा (तनूदूषिम्) = शरीर को दूषित ही कर डालता है।
Essence
हृदय में उत्पन्न हो जानेवाली इस कामानि को हम ज्ञान व कर्म में व्याप्त रहकर दूर करते हैं। इसने ही तो हमारे जीवन को अशान्त बनाया हुआ था, शक्तियों को विनष्ट कर दिया था तथा सारे शरीर को ही दूषित कर दिया था।
Subject
'म्रोक-खनि' काम