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Atharvaveda - Mantra 3

Atharvaveda 16/1/3

9 Sukta
13 Mantra
16/1/3
Devata- द्विपदा साम्नी बृहती Rishi- प्रजापति Chhanda- अथर्वा Suktam- दुःख मोचन सूक्त
Mantra with Swara
म्रो॒को म॑नो॒हाख॒नो नि॑र्दा॒ह आ॑त्म॒दूषि॑स्तनू॒दूषिः॑ ॥

म्रो॒क: । म॒न॒:ऽहा । ख॒न: । नि॒:ऽदा॒ह: । आ॒त्म॒ऽदूषि॑: । त॒नू॒ऽदूषि॑: ॥१.३॥

Mantra without Swara
म्रोको मनोहाखनो निर्दाह आत्मदूषिस्तनूदूषिः ॥

म्रोक: । मन:ऽहा । खन: । नि:ऽदाह: । आत्मऽदूषि: । तनूऽदूषि: ॥१.३॥

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1 Bhashyas
Meaning
१. उत्तम प्रेरणाओं के अभाव में मन बड़ा अशान्त हो जाता है। यह कामवासना' का शिकार होता है। यह 'काम' (म्रोकः) = [म्रुच to go, to move] मन को अतिशयेन चञ्चल व अशान्त कर देता है। (मनोहा) = मन को मार ही डालता है, चिन्तन की शक्ति रह ही नहीं जाती उत्साह नहीं रहता। (खन:) = [खनु अवदारणे] शरीर की सब शक्तियों का भी यह अवदारण कर देता है। (निर्दाह:) = वासना के सन्ताप से यह सदा जलता रहता है। २. (आत्मदूषि:) = यह काम मन को तो दूषित करता ही है (तनूदूषिः) = शरीर को भी दूषित कर डालता है। यह मदन [कामदेव] 'मन्मथ' है-चेतना को नष्ट करनेवाला है और 'मार' है-शरीर की शक्तियों को नष्ट करके मार ही डालता है।
Essence
कामवासना जीवन में अशान्ति व अज्ञान पैदा करती है। यह शक्तियों का अवदारण करके हृदय में जलन का कारण बनती है। यह मन व शरीर को दूषित करती है।
Subject
आत्मदूधि:-तनूदूषिः