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Atharvaveda - Mantra 13

Atharvaveda 16/1/13

9 Sukta
13 Mantra
16/1/13
Devata- आर्ची अनुष्टुप् Rishi- प्रजापति Chhanda- अथर्वा Suktam- दुःख मोचन सूक्त
Mantra with Swara
शि॒वान॒ग्नीन॑प्सु॒षदो॑ हवामहे॒ मयि॑ क्ष॒त्रं वर्च॒ आ ध॑त्त दे॒वीः ॥

शि॒वान् । अ॒ग्नीन् । अ॒प्सु॒ऽसद॑: । ह॒वा॒म॒हे॒ । मयि॑ । क्ष॒त्रम् । वर्च॑: । आ । ध॒त्त॒ । दे॒वी॒: ॥१.१३॥

Mantra without Swara
शिवानग्नीनप्सुषदो हवामहे मयि क्षत्रं वर्च आ धत्त देवीः ॥

शिवान् । अग्नीन् । अप्सुऽसद: । हवामहे । मयि । क्षत्रम् । वर्च: । आ । धत्त । देवी: ॥१.१३॥

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Meaning
१. हम कामाग्नि को शान्त करके उन (शिवान् अग्नीन्) = कल्याणकारिणी 'तेजस्विता-स्नेह व ज्ञान' की अग्नियों को (हवामहे) = पुकारते हैं, जोकि (अप्सुषदः) = इन सुरक्षित रेत:कणों में आसीन होनेवाली है। रेत:कणों के रक्षण से शरीर में तेजस्विता की अग्नि, हृदय में स्नेह की अग्नि तथा मस्तिष्क में ज्ञान की अग्नि का प्रादुर्भाव होता है। २. हे (देवी:) = रेत:कणरूप दिव्यगुणों से युक्त जलो! (मयि) = मुझमें (क्षत्रम्) = क्षतों से त्राण करनेवाले बल को तथा (वर्च:) = रोगों का निवारण करनेवाली प्राणशक्ति को (आधत्त) = स्थापित करो।
Essence
शरीर में सुरक्षित रेत:कण हमें 'क्षत्र व वर्चस्' प्राप्त कराते हैं। इनमें ही 'तेजस्विता, स्नेह व ज्ञान' की अग्नियाँ निहित हैं।
Subject
क्षत्रं+वर्चः