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Atharvaveda - Mantra 4

Atharvaveda 15/6/4

18 Sukta
26 Mantra
15/6/4
Devata- आसुरी पङ्क्ति Rishi- अध्यात्म अथवा व्रात्य Chhanda- अथर्वा Suktam- अध्यात्म प्रकरण सूक्त
Mantra with Swara
स ऊ॒र्ध्वांदिश॒मनु॒ व्यचलत् ॥

स: । ऊ॒र्ध्वाम् । दिश॑म् । अनु॑ । वि । अ॒च॒ल॒त् ॥६.४॥

Mantra without Swara
स ऊर्ध्वांदिशमनु व्यचलत् ॥

स: । ऊर्ध्वाम् । दिशम् । अनु । वि । अचलत् ॥६.४॥

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Meaning
१. (सः) = वह व्रात्य (ऊर्ध्वां दिशं अनुव्यचलत्) = ऊर्ध्वादिक् का लक्ष्य करके गतिवाला हुआ। उस समय (तम्) = उस व्रात्य को (ऋतं च सत्यं च) = भौतिक जगत् के नियम [सब भौतिक क्रियाओं की नियमितता] तथा अध्यात्म जगत्-नियम [शुद्ध, नैतिक आचरण], (सूर्यः च चन्द्र: नक्षत्राणि च) = सूर्य, चन्द्र और नक्षत्र ये सब (अनुव्यचलन्) = अनुकूलता से प्राप्त हुए। २. (यः एवं वेद) = जो इसप्रकार ऊवादिक् को समझता है, (स:) = वह व्रात्य (वै) = निश्चय से (ऋतस्य च सत्यस्य च) = ऋत और सत्य का तथा (सूर्यस्य च चन्द्रस्य च नक्षत्राणां च) = सूर्य, चन्द्र, नक्षत्रों का (प्रियं धाम भवति) = प्रियस्थान बनता है।
Essence
एक व्रात्य विद्वान् ऊध्वादिक् की ओर ध्यान करता है तो उसे सृष्टि में ऋत और सत्य कार्य करते हुए दिखते हैं तथा सूर्य, चन्द्र व नक्षत्रों में प्रभु की महिमा दिखती है।
Subject
ऊर्ध्वा दिक् में 'ऋत, सत्य, सूर्य-चन्द्र व नक्षत्र'