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Atharvaveda - Mantra 20

Atharvaveda 15/6/20

18 Sukta
26 Mantra
15/6/20
Devata- साम्नी अनुष्टुप् Rishi- अध्यात्म अथवा व्रात्य Chhanda- अथर्वा Suktam- अध्यात्म प्रकरण सूक्त
Mantra with Swara
तं दिति॒श्चादि॑ति॒श्चेडा॑ चेन्द्रा॒णी चा॑नु॒व्यचलन् ॥

तम् । दिति॑: । च॒ । अदि॑ति: । च॒ । इडा॑ । च॒ । इ॒न्द्रा॒णी । च॒ । अ॒नु॒ऽव्य᳡चलनम् ॥६.२०॥

Mantra without Swara
तं दितिश्चादितिश्चेडा चेन्द्राणी चानुव्यचलन् ॥

तम् । दिति: । च । अदिति: । च । इडा । च । इन्द्राणी । च । अनुऽव्यचलनम् ॥६.२०॥

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Meaning
१. (सः) = वह व्रात्य (अनावृत्तां दिशं अनुव्यचलत्) = अनावृत्ता दिशा में अनुकूलता से गतिवाला हुआ (ततः) = तब (न आवर्त्स्यन् अमन्यत) = 'लौटूंगा नहीं', ऐसा उसने विचार किया। 'आगे और आगे चलते चलना, लौटना नहीं, वही वस्तुत: एक संन्यस्त का आदर्श है। (तम्) = उस व्रात्य को इस अनावृत्ता दिशा में चलने पर (दितिः च अदितिः च) = वासनाओं का खण्डन और स्वास्थ्य का अखण्डन [पवित्रता व स्वास्थ्य] (च) = तथा (इडा इन्द्राणी च) = वेदवाणी और इन्द्रशक्ति (अनुव्यचलन्) = अनुकूलता से प्राप्त हुई। २. (यः एवं वेद) = जो इसप्रकार न लौटने की दिशा के महत्व को समझ लेता है (सः) = वह व्रात्य (वै) = निश्चय से (दितेः च अदिते: च) = वासना-विनाश और स्वास्थ्य के अविनाश का (च) = तथा (इडायाः इन्द्राण्या: च) = वेदवाणी व इन्द्रशक्ति का (प्रियं धाम भवति) = प्रिय आधार बनता है।
Essence
हम 'आगे बढ़ना और न लौटने का व्रत लेकर 'पवित्र, स्वस्थ, ज्ञानी व आत्मशक्ति-सम्पन्न' बनें।
Subject
अनावृत्ता दिशा में 'दिति, अदिति, इडा, इन्द्राणी'