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Atharvaveda - Mantra 3

Atharvaveda 15/5/3

18 Sukta
16 Mantra
15/5/3
Devata- द्विपदा प्राजापत्या अनुष्टुप् Rishi- रुद्र Chhanda- अथर्वा Suktam- अध्यात्म प्रकरण सूक्त
Mantra with Swara
नास्य॑ प॒शून्न स॑मा॒नान्हि॑नस्ति॒ य ए॒वं वेद॑ ॥

न । अ॒स्य॒ । प॒शून् । न । स॒मा॒नम् । हि॒न॒स्ति॒ । य: । ए॒वम् । वेद॑ ॥५.३॥

Mantra without Swara
नास्य पशून्न समानान्हिनस्ति य एवं वेद ॥

न । अस्य । पशून् । न । समानम् । हिनस्ति । य: । एवम् । वेद ॥५.३॥

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1 Bhashyas
Meaning
१. (तस्मै) = उस व्रात्य के लिए सब देवों ने (प्राच्याः दिश: अन्तर्देशात्) = पूर्व दिशा के अन्तर्देश [मध्यदेश] से (भवम्) = सर्वोत्पादक प्रभु को (इष्वासम्) = धनुर्धारी-धनुष के द्वारा रक्षक (अनुष्ठातारम्) सब क्रियाओं का करनेवाला (अकुर्वन) = किया। इसे बाल्यकाल से ही यह शिक्षा प्राप्त हुई थी कि वे सर्वोत्पादक प्रभु तुम्हारे रक्षक हैं और सब क्रियाएँ उन्हीं की शक्ति व कृपा से होती हैं। २. (भवः) = वह सर्वोत्पादक (इष्वासः) = धनुर्धर प्रभु (एनम्) = इस व्रात्य को (प्राच्याः दिशः अन्तर्देशात्) = पूर्व दिशा के मध्यदेश से (अनुष्ठाता) = सब कार्यों को करने का सामर्थ्य देता हुआ (अनुतिष्ठति) = अनुकूलता से स्थित होता है। ३. (यः एवं वेद) = जो इस प्रकार उस "भव, इष्वास, अनुष्ठाता' प्रभु को समझ लेता है (एनम्) = इस विद्वान् व्रात्य को (शर्वा:) = वह [भृ हिंसायाम्] प्रलय कर्ता प्रभु [रुद्र], (न भवः) = न ही [ब्रह्म] सर्वोत्पादक प्रभु, (न ईशानः) = न ही ईश [शासक, विष्णु] (हिनस्ति) = विनष्ट करते हैं। (अस्य) = इसके (पशून् न) = पशुओं को भी नष्ट नहीं करते। (न समानान्) = न इसके समान-तुल्य गुणवाले व्यक्तियों को, बन्धु-बान्धवों को विनष्ट करते हैं।
Essence
यह व्रात्य विद्वान् पूर्वदिशा के अन्तर्देश में उस सर्वोत्पादक प्रभु को ही अपना, अपने पशुओं का, अपने समान बन्धु-बान्धवों का रक्षक जानता है, उन्हें ही कार्य करने की शक्ति देनेवाला समझता है।
Subject
प्राच्याः दिशः अन्तर्देशात्