Available Bhashyas

Bhashyas

Choose the bhashyas to show on this mantra page.

Atharvaveda - Mantra 8

Atharvaveda 15/4/8

18 Sukta
18 Mantra
15/4/8
Devata- आर्ची अनुष्टुप् Rishi- अध्यात्म अथवा व्रात्य Chhanda- अथर्वा Suktam- अध्यात्म प्रकरण सूक्त
Mantra with Swara
वार्षि॑कौ॒ मासौ॑गो॒प्तारा॒वकु॑र्वन्वैरू॒पं च॑ वैरा॒जं चा॑नुष्ठा॒तारौ॑ ॥

वार्षि॑कौ । मासौ॑ । गो॒प्तारौ॑ । अकु॑र्वन् । वै॒रू॒पम् । च॒ । वै॒रा॒ज॒म् । च॒ । अ॒नु॒ऽस्था॒तारौ॑ ॥४.८॥

Mantra without Swara
वार्षिकौ मासौगोप्तारावकुर्वन्वैरूपं च वैराजं चानुष्ठातारौ ॥

वार्षिकौ । मासौ । गोप्तारौ । अकुर्वन् । वैरूपम् । च । वैराजम् । च । अनुऽस्थातारौ ॥४.८॥

Available Bhashyas

1 Bhashyas
Meaning
१. (तस्मै) = उस व्रात्य के लिए (प्रतीच्याः दिश:) = पश्चिम दिशा से सब देव (वार्षिकौ मासौ) = वर्षा ऋतु के दो मासों को (गौप्तारौ अकुर्वन्) = रक्षक बनाते हैं (च) = तथा (वैरूपम्) = विशिष्ट तेजस्विता-सम्पन्न रूप को वैराजं च तथा विशिष्ट ज्ञानदीप्ति को (अनुष्ठातारौ) = विहित कार्यसाधक बनाते हैं। २. (यः एवं वेद) = जो इसप्रकार 'बैरूप और विराज' के महत्व को समझता है, (एनम्) = इस व्रात्य को (वार्षिकौ मासौ) = वर्षा के दो मास (प्रतीच्या: दिश:) = पश्चिम दिशा से (गोपायत:) = रक्षित करते है, (च) = तथा (वैरूपम्) = विशिष्ट तेजस्विता-सम्पन्न रूप (वैराजं च) = और विशिष्ट ज्ञानदीप्ति (अनुतिष्ठत:) = विहित कर्मों को सिद्ध करने में प्रवृत्त होते हैं।
Essence
व्रात्य को पश्चिम दिशा से वर्षा के दो मास रक्षित करते हैं और 'वैरूप तथा वैराज' विहित कर्मों को सिद्ध करने में समर्थ करते हैं।
Subject
प्रतीच्याः दिशः