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Atharvaveda - Mantra 17

Atharvaveda 15/4/17

18 Sukta
18 Mantra
15/4/17
Devata- आर्ची उष्णिक् Rishi- अध्यात्म अथवा व्रात्य Chhanda- अथर्वा Suktam- अध्यात्म प्रकरण सूक्त
Mantra with Swara
शै॑शि॒रौ मासौ॑गो॒प्तारा॒वकु॑र्व॒न्दिवं॑ चादि॒त्यं चा॑नुष्ठा॒तारौ॑ ॥

शै॒शि॒रौ । मासौ॑ । गो॒प्तारौ॑ । अकु॑र्वन् । दिव॑म् । च॒ । आ॒दि॒त्यम् । च॒ । अ॒नु॒ऽस्था॒तारौ॑ ॥४.१७॥

Mantra without Swara
शैशिरौ मासौगोप्तारावकुर्वन्दिवं चादित्यं चानुष्ठातारौ ॥

शैशिरौ । मासौ । गोप्तारौ । अकुर्वन् । दिवम् । च । आदित्यम् । च । अनुऽस्थातारौ ॥४.१७॥

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Meaning
१. (तस्मै) = उस व्रात्य विद्वान् के लिए (ऊर्ध्वाया: दिश:) = ऊर्ध्वा दिशा से सब देवों ने (शैशिरौ मासौ) = शिशिर ऋतु के दो मासों को (गोप्तारौ अकुर्वन्) = रक्षक बनाया। (दिवं च आदित्यं च) = मस्तिष्करूप धुलोक को तथा ज्ञानरूप आदित्य को (अनुष्ठातारौ) = विहित कार्यसाधक बनाया। (यः) = जो विद्वान् (एवं वेद) = इसप्रकार ज्ञानसम्पन्न मस्तिष्क के महत्त्व को समझता है (एनम्) = इस व्रात्य को (शैशिरौ मासौ) = शिशिर ऋतु के दो मास (ऊर्ध्वाया: दिश:) = ऊर्ध्वा दिक् से (गोपायत:) = रक्षित करते हैं (च) = तथा (द्यौः आदित्यः च) = मस्तिष्क तथा ज्ञान [धी:-विद्या] (अनुतिष्ठत:) = इसके सब विहित कार्यों को सिद्ध करते है। यह ज्ञान-सम्पन्न मस्तिष्क से पवित्र कार्यों का ही सम्पादन करनेवाला होता है।
Essence
ऊर्ध्वा दिक् से शिशिर के दो मास व्रात्य विद्वान् की रक्षा करते हैं और यह व्रात्य विद्वान् ज्ञानसम्पन्न मस्तिष्क से विहित कार्यों का सम्पादन करता है।
Subject
ऊर्ध्वाया: दिशः
Special
सम्पूर्ण सूक्त का सार यह है कि व्रात्य विद्वान् सब कालों में स्वस्थ जीवनवाला होता हुआ अपने जीवन में 'ज्ञान, कर्म व उपासना' का समन्वय करता हुआ शास्त्रविहित कर्तव्यों के अनुष्ठान में तत्पर रहता है।