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Atharvaveda - Mantra 11

Atharvaveda 15/4/11

18 Sukta
18 Mantra
15/4/11
Devata- साम्नी त्रिष्टुप् Rishi- अध्यात्म अथवा व्रात्य Chhanda- अथर्वा Suktam- अध्यात्म प्रकरण सूक्त
Mantra with Swara
शा॑र॒दौ मासौ॑गो॒प्तारा॒वकु॑र्वञ्छ्यै॒तं च॑ नौध॒सं चा॑नुष्ठा॒तारौ॑ ॥

शा॒र॒दौ । मासौ॑ । गो॒प्तारौ॑ । अकु॑र्वन् । श्यै॒तम् । च॒ । नौ॒ध॒सम् । च॒ । अ॒नु॒ऽस्था॒तारौ॑ ॥४.११॥

Mantra without Swara
शारदौ मासौगोप्तारावकुर्वञ्छ्यैतं च नौधसं चानुष्ठातारौ ॥

शारदौ । मासौ । गोप्तारौ । अकुर्वन् । श्यैतम् । च । नौधसम् । च । अनुऽस्थातारौ ॥४.११॥

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Meaning
१. (तस्मै) = उस व्रात्य के लिए (उदीच्याः दिश:) = उत्तर दिशा से सब देवों ने (शारदौ मासौ) = शरद् ऋतु के दो मासों को (गोसतारौ अकुर्वन्) = रक्षक बनाया, (च) = तथा (श्यैतम्) = क्रियाशीलता को (नौधसं च) = और प्रभु-स्तवन को (अनुष्ठातारौ) = विहित कार्यसाधक बनाया। २. (यः) = जो (एवं वेद) = इसप्रकार क्रियाशीलता व प्रभु-स्तवन के महत्त्व को समझता है (एनम्) = इस व्रात्य विद्वान् की (उदीच्या: दिश:) = उत्तर दिशा से (शारदौ मासौ) = शरद् ऋतु के दो मास (गोपायत:) = रक्षित करते हैं (च) = और (श्यैतं नौधसं च) = क्रियाशीलता व प्रभु-स्तवन विहित कार्यों के सिद्ध करने में प्रवृत्त करते हैं।
Essence
व्रात्य विद्वान् उत्तर दिशा की ओर से शरद् ऋतु के दो मासों से रक्षित किया जाता है तथा क्रियाशीलता व प्रभु-स्तवन इसे विहितकार्यों के अनुष्ठान में प्रवृत्त करते हैं।
Subject
उदीच्याः दिशः