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Atharvaveda - Mantra 10

Atharvaveda 15/3/10

18 Sukta
11 Mantra
15/3/10
Devata- प्राजापत्या त्रिष्टुप् Rishi- अध्यात्म अथवा व्रात्य Chhanda- अथर्वा Suktam- अध्यात्म प्रकरण सूक्त
Mantra with Swara
तस्य॑ देवज॒नाःप॑रिष्क॒न्दा आस॑न्त्संक॒ल्पाः प्र॑हा॒य्या॒ विश्वा॑नि भू॒तान्यु॑प॒सदः॑ ॥

तस्य॑ । दे॒व॒ऽज॒ना: । प॒रि॒ऽस्क॒न्दा: । आस॑न् । स॒म्ऽक॒ल्पा: । प्र॒ऽहा॒य्या᳡: । विश्वा॑नि । भू॒तानि॑ । उ॒प॒ऽसद॑: ॥३.१०॥

Mantra without Swara
तस्य देवजनाःपरिष्कन्दा आसन्त्संकल्पाः प्रहाय्या विश्वानि भूतान्युपसदः ॥

तस्य । देवऽजना: । परिऽस्कन्दा: । आसन् । सम्ऽकल्पा: । प्रऽहाय्या: । विश्वानि । भूतानि । उपऽसद: ॥३.१०॥

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Meaning
१. (तस्य) = उस ब्रात्य के (देवजना:) = माता-पिता-आचार्यादि देव (परिष्कन्दा: आसन्) = चारों ओर गति करनेवाले रक्षक होते हैं। इनके रक्षण में यह अपना लोकहित का कार्य उत्तमता से कर पाता है। (संकल्पा:) = उस-उस कार्य को करने के संकल्प इसके (प्रहाय्या:) = दूत होते है। इन संकल्पों के द्वारा यह अपने कार्यों को करने में समर्थ होता है। (विश्वानि भूतानि) = सब प्राणी (उपसदः) = इसके समीप बैठनेवाले होते हैं-इसी की शरण में जाते हैं, इसे ही वे अपना सहारा मानते हैं। २. (य:) = जो भी व्रात्य (एवं वेद) = इसप्रकार समझ लेता है कि उसका जीवनलक्ष्य 'भूतहित' ही है, (अस्य) = इसके (विश्वानि एव भूतानि) = सभी प्राणी (उपसदः भवन्ति) = समीप आसीन होनेवाले होते हैं।
Essence
लोकहित में प्रवृत्त व्रात्य को 'माता-पिता-आचार्य' आदि देवों का रक्षण प्राप्त होता है। संकल्पों द्वारा यह अपने सन्देश को दूर तक पहुँचाने में समर्थ होता है और सब प्राणी इसकी शरण में आते हैं।
Subject
देवजनों के रक्षण में