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Atharvaveda - Mantra 1

Atharvaveda 15/3/1

18 Sukta
11 Mantra
15/3/1
Devata- पिपीलिकमध्या गायत्री Rishi- अध्यात्म अथवा व्रात्य Chhanda- अथर्वा Suktam- अध्यात्म प्रकरण सूक्त
Mantra with Swara
ससं॑वत्स॒रमू॒र्ध्वोऽति॑ष्ठ॒त्तं दे॒वा अ॑ब्रुव॒न्व्रात्य॒ किं नु ति॑ष्ठ॒सीति॑॥

स: । स॒म्ऽव॒त्स॒रम् । ऊ॒र्ध्व: । अ॒ति॒ष्ठ॒त् । तम् । दे॒वा: । अ॒ब्रु॒व॒न् । व्रात्य॑ । किम् । नु । ति॒ष्ठ॒सि॒ । इति॑ ॥३.१॥

Mantra without Swara
ससंवत्सरमूर्ध्वोऽतिष्ठत्तं देवा अब्रुवन्व्रात्य किं नु तिष्ठसीति॥

स: । सम्ऽवत्सरम् । ऊर्ध्व: । अतिष्ठत् । तम् । देवा: । अब्रुवन् । व्रात्य । किम् । नु । तिष्ठसि । इति ॥३.१॥

Meaning
१. (सः) = वह व्रात्य विद्वान् (संवत्सरम्) = वर्षभर (कय: अतिष्ठत्) = संसार से मानो ऊपर उठा हुआ ही, अपनी तपस्या में ही स्थित रहा। (तम्) = उसको (देवा:अब्रुवन्) = देववृत्ति के व्यक्तियों ने मिलकर कहा अथवा माता-पिता व आचार्यादि ने (इति) = इसप्रकार कहा कि-हे (व्रात्य) = व्रतमय जीवनवाले विद्धन ! (किम्) = क्या (नु) = अब भी तिष्ठति (इति) = इसप्रकार तपस्या में ही स्थित हुए हो। अब कहीं आश्रम में स्थित होकर लोकहित के दृष्टिकोण से कार्य आरम्भ करो न? २. इसप्रकार देवों के आग्रह पर (स:) = उस व्रात्य ने (इति) = इसप्रकार (अब्रवीत्) = कहा कि मे-मेरे लिए आप आसन्दी संभरन्तु-आसन्दी का संभरण करने की कृपा कीजिए। 'मुझे कहाँ बैठकर कार्य करना चाहिए', उस बात का आप निर्देश कीजिए। ३. यह उत्तर पाने पर सब देवों ने (तस्मै व्रात्याय) = उस व्रात्य के लिए (आसन्दी समभरन) = आसन्दी प्राप्त कराई। वस्तुतः वह आसन्दी क्या थी? सारा काल ही उस आसन्दी के चार चरणों के रूप में था। इस आसन्दी के संभरण का कोई शभ महूर्त थोड़े ही निकालना था। शुभ कार्य के लिए सारा समय ही शुभ है। ४. देवों से प्राप्त कराई गई (तस्याः) = उस आसन्दी के (ग्रीष्मः च वसन्तः च) = ग्रीष्म और वसन्त (ऋतु दौ पादौ आस्ताम्) = दो पाँव थे तथा (शरद च वर्षा च दौ) = शरद और वर्षा दूसरे दो पाये बने। वस्तुत: इस व्रात्य ने न सर्दी देखनी है न गर्मी, न वर्षा न पतझड़। उसने तो सदा ही लोकहित के कार्यों में प्रवृत्त होना है।
Essence
-व्रात्य विद्वान् संसार से अलग रहकर तपस्या ही न करता रह जाए। उसे लोकहित के कार्यों को भी अवश्य करना ही चाहिए और इन शुभ कार्यों के लिए मुहूर्त ढूँढने की आवश्यकता नहीं। शुभ कार्य के लिए सारा समय शुभ ही है।
Subject
व्रात्य की आसन्दी

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