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Atharvaveda - Mantra 16

Atharvaveda 15/2/16

18 Sukta
28 Mantra
15/2/16
Devata- साम्नी त्रिष्टुप् Rishi- अध्यात्म अथवा व्रात्य Chhanda- अथर्वा Suktam- अध्यात्म प्रकरण सूक्त
Mantra with Swara
तं वै॑रू॒पं च॑वैरा॒जं चाप॑श्च॒ वरु॑णश्च॒ राजा॑नु॒व्यचलन् ॥

तम् । वै॒रू॒पम् । च॒ । वै॒रा॒जम् । च॒ । आप॑: । च॒ । वरु॑ण: । च॒ । राजा॑ । अ॒नु॒ऽव्य᳡चलन् ॥२.१६॥

Mantra without Swara
तं वैरूपं चवैराजं चापश्च वरुणश्च राजानुव्यचलन् ॥

तम् । वैरूपम् । च । वैराजम् । च । आप: । च । वरुण: । च । राजा । अनुऽव्यचलन् ॥२.१६॥

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Meaning
१.(सः) = वह व्रात्य विद्वान (उदतिष्ठत) = उठा और आलस्य को दूर भगाकर (प्रतीचीं दिशं अनुव्यचलत्) = प्रतीची दिशा की ओर प्रति अञ्च' प्रत्याहार की दिशा में चला। इन्द्रियों को इसने विषय-व्यावृत्त करने का प्रयत्न किया। २. इस प्रत्याहार के होने पर (तम्) = उस व्रात्य विद्वान् को (वैरूपं च) = विशिष्ट तेजस्वीरूप (वैराजं च) = विशिष्ट ज्ञानदीप्ति, (आप: च) = रेत:कण [आप: रेतो भूत्वा०], (वरुणः च राजा) = और जीवन को दीप्त करनेवाला [राजा], नि?षता का भाव (अनुव्यचलन्) = अनुकूलता से प्राप्त हुए। ३. (सः) = वह व्रात्य विद्वान् (वै) = निश्चय से (वैरूपाय च) = विशिष्ट तेजस्वीरूप के लिए, (वैराजाय च) = विशिष्ट ज्ञानदीप्ति के लिए, (अजय: च) = शरीर में रेत:कणों के रक्षण के लिए (च) = तथा (वरुणाय राज्ञः) = जीवन को दीप्त बनानेवाले निडेषता के भाव के लिए (आवश्चते) = समन्तात् वासनाओं का छेदन करता है। यह पुरुष भी वासनाओं का छेदन करता है, (यः) = जो (एवम्) = इसप्रकार (व्रात्यम्) = वती (विद्वांसम्) = विद्वान् के (उपवदति) = समीप होकर इन बातों की चर्चा करता है ४. (स:) = वह (वैरूपस्य च) = विशिष्ट तेजस्वीरूप का, (वैराजाय च) = विशिष्ट ज्ञानदीति का, (अपां च) = रेत:कणों का (च) = और (राज्ञः वरुणस्य) = जीवन को दीप्त बनानेवाले निद्वेषता के भाव का (प्रियं धाम भवति) = प्रिय स्थान बनता है। (तस्य) = उस विद्वान् व्रात्य के (प्रतीच्यां दिशि) = इस प्रत्याहार की दिशा में 'वैरूप, वैराज्ञ, आपः और वरुण राजा' साथी बनते हैं।
Essence
यह व्रात्य विद्वान् प्रत्याहार के द्वारा 'विशिष्ट तेजस्वीरूप को, विशिष्ट ज्ञानदीप्ति को, रेत:कणों को तथा जीवन को दीप्स बनानेवाली निढेषता' को प्राप्त करता है।
Subject
प्रतीची दिशा में 'वैरूप, वैराज, आपः, वरुण राजा'