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Atharvaveda - Mantra 4

Atharvaveda 15/14/4

18 Sukta
24 Mantra
15/14/4
Devata- द्विपदासुरी गायत्री Rishi- अध्यात्म अथवा व्रात्य Chhanda- अथर्वा Suktam- अध्यात्म प्रकरण सूक्त
Mantra with Swara
बले॑नान्ना॒देनान्न॑मत्ति॒ य ए॒वं वेद॑ ॥

बले॑न । अ॒न्न॒ऽअ॒देन॑ । अन्न॑म् । य: । ए॒वम् । वेद॑ ॥१४.४॥

Mantra without Swara
बलेनान्नादेनान्नमत्ति य एवं वेद ॥

बलेन । अन्नऽअदेन । अन्नम् । य: । एवम् । वेद ॥१४.४॥

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1 Bhashyas
Meaning
१. (स:) = वह (यत्) = जब (दक्षिणां दिशं अनुष्यचलत्) = दक्षिणा [नैपुण्य] की दिशा की ओर चला तो (इन्द्रः भूत्वा अनुव्यचलत्) = जितेन्द्रिय बनकर चला। जितेन्द्रिय बनकर ही हम दाक्षिण्य प्राप्त कर सकते हैं। २. दाक्षिण्य प्राप्त करनेवाला (यः) = जो भी व्यक्ति (एवं वेद) = इस तत्व को समझ लेता है कि जितेन्द्रियता से दाक्षिण्य प्राप्त किया जा सकता है, वह जितेन्द्रिय बनकर (बलं आन्नदं कृत्वा) = बल को अन्न खानेवाला करके आगे बढ़ता है। (अन्नादेन बलेन अन्नं अत्ति) = अन्न को खानेवाले बल से अन्न को खाता है। उसी अन्न को खाता है जो बल को बढ़ानेवाला है। ये किसी भी स्वाद को भोजन का मापक नहीं बनाता।
Essence
हम जितेन्द्रिय बनकर दाक्षिण्य प्राप्त करें। बल के वर्धन के दृष्टिकोण से ही भोजन करें|
Subject
इन्द्र+अन्नादं बलं