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Atharvaveda - Mantra 3

Atharvaveda 15/14/3

18 Sukta
24 Mantra
15/14/3
Devata- पुर उष्णिक् Rishi- अध्यात्म अथवा व्रात्य Chhanda- अथर्वा Suktam- अध्यात्म प्रकरण सूक्त
Mantra with Swara
स यद्दक्षि॑णां॒दिश॒मनु॒ व्यच॑लद्भू॒त्वानु॒व्यचल॒द्बल॑मन्ना॒दं कृ॒त्वा ॥

स: । यत् । दक्षि॑णाम् । दिश॑म् । अनु॑ । वि॒ऽअच॑लत् । इन्द्र॑: । भू॒त्वा । अ॒नु॒ऽव्य᳡चलत् । बल॑म् । अ॒न्न॒ऽअ॒दम् । कृ॒त्वा ॥१४.३॥

Mantra without Swara
स यद्दक्षिणांदिशमनु व्यचलद्भूत्वानुव्यचलद्बलमन्नादं कृत्वा ॥

स: । यत् । दक्षिणाम् । दिशम् । अनु । विऽअचलत् । इन्द्र: । भूत्वा । अनुऽव्यचलत् । बलम् । अन्नऽअदम् । कृत्वा ॥१४.३॥

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Meaning
१. (स:) = वह (यत्) = जब (दक्षिणां दिशं अनुष्यचलत्) = दक्षिणा [नैपुण्य] की दिशा की ओर चला तो (इन्द्रः भूत्वा अनुव्यचलत्) = जितेन्द्रिय बनकर चला। जितेन्द्रिय बनकर ही हम दाक्षिण्य प्राप्त कर सकते हैं। २. दाक्षिण्य प्राप्त करनेवाला (यः) = जो भी व्यक्ति (एवं वेद) = इस तत्व को समझ लेता है कि जितेन्द्रियता से दाक्षिण्य प्राप्त किया जा सकता है, वह जितेन्द्रिय बनकर (बलं आन्नदं कृत्वा) = बल को अन्न खानेवाला करके आगे बढ़ता है। (अन्नादेन बलेन अन्नं अत्ति) = अन्न को खानेवाले बल से अन्न को खाता है। उसी अन्न को खाता है जो बल को बढ़ानेवाला है। ये किसी भी स्वाद को भोजन का मापक नहीं बनाता।
Essence
हम जितेन्द्रिय बनकर दाक्षिण्य प्राप्त करें। बल के वर्धन के दृष्टिकोण से ही भोजन करें|
Subject
इन्द्र+अन्नादं बलं