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Atharvaveda - Mantra 23

Atharvaveda 15/14/23

18 Sukta
24 Mantra
15/14/23
Devata- निचृत आर्ची पङ्क्ति Rishi- अध्यात्म अथवा व्रात्य Chhanda- अथर्वा Suktam- अध्यात्म प्रकरण सूक्त
Mantra with Swara
सयत्सर्वा॑नन्तर्दे॒शाननु॒ व्यच॑लत्परमे॒ष्ठीभू॒त्वानु॒व्यचल॒द्ब्रह्मा॑न्ना॒दं कृ॒त्वा ॥

स: । यत् । सर्वा॑न् । अ॒न्त॒:ऽदे॒शान् । अनु॑ । वि॒ऽअच॑लत् । प॒र॒मे॒ऽस्थी। भू॒त्वा । अ॒नु॒ऽव्य᳡चलत् । ब्रह्म॑ । अ॒न्न॒ऽअ॒दम् । कृ॒त्वा ॥१४.२३॥

Mantra without Swara
सयत्सर्वानन्तर्देशाननु व्यचलत्परमेष्ठीभूत्वानुव्यचलद्ब्रह्मान्नादं कृत्वा ॥

स: । यत् । सर्वान् । अन्त:ऽदेशान् । अनु । विऽअचलत् । परमेऽस्थी। भूत्वा । अनुऽव्यचलत् । ब्रह्म । अन्नऽअदम् । कृत्वा ॥१४.२३॥

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1 Bhashyas
Meaning
१. (स:) = वह (यत्) = जब (सर्वान् अन्तर्देशान्) = सब अन्तर्देशों में प्रजाओं के निवासस्थानों में (अनुव्यचलत्) = अनुकूलता से गतिवाला हुआ तो (परमेष्ठी भूत्वा अनुव्यचलत्) = परम स्थान में स्थित होता हुआ गतिवाला हुआ। प्रजाहित के लिए सब अन्तर्देशों में भ्रमण ही मानवजीवन का चरमोत्कर्ष है। इस समय यह (ब्रह्म अन्नादं कृत्वा) = ब्रह्म को ही अन्नाद बनाकर चला। भोजन को केवल इसलिए खाने लगा कि स्वस्थ शरीर में मैं ब्रह्मदर्शन कर पाऊँगा। २. (यः एवं वेद) = जो इसप्रकार प्रजाहित के लिए सब अन्तर्देशों में विचरण को आवश्यक समझ लेता है, वह परमेष्ठी [व्रात्य] (ब्रह्मणा अन्नादेन अन्नम् अत्ति) = अन्न को खानेवाले ब्रह्म से ही अन्न को खाता है भोजन का उद्देश्य ही ब्रह्म-प्राप्ति ही जानता है। जो भोजन ब्रह्म-प्राप्ति के मार्ग पर चलने में सहायक है, उन्हीं को करता है।
Essence
प्रजाहित के लिए सब अन्तर्देशों में विचरते हुए हम 'परमेष्ठी' बनें। उन्हीं भोजनों को करें जो हमारी प्रवृत्तियों को ब्रह्मप्रवण करनेवाले हों।
Subject
परमेष्ठी+अन्नाद ब्रह्म