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Atharvaveda - Mantra 17

Atharvaveda 15/14/17

18 Sukta
24 Mantra
15/14/17
Devata- आर्ची पङ्क्ति Rishi- अध्यात्म अथवा व्रात्य Chhanda- अथर्वा Suktam- अध्यात्म प्रकरण सूक्त
Mantra with Swara
स यदू॒र्ध्वांदिश॒मनु॒ व्यच॑ल॒द्बृह॒स्पति॑र्भू॒त्वानु॒व्यचलद्वषट्का॒रम॑न्ना॒दं कृ॒त्वा॥

स: । यत् । ऊ॒र्ध्वाम् । दिश॑म् । अनु॑ । वि॒ऽअच॑लत् । बृह॒स्पति॑: । भू॒त्वा । अ॒नु॒ऽव्य᳡चलत् । व॒ष॒ट्ऽका॒रम् । अ॒न्न॒ऽअ॒दम् । कृ॒त्वा ॥१४.१७॥

Mantra without Swara
स यदूर्ध्वांदिशमनु व्यचलद्बृहस्पतिर्भूत्वानुव्यचलद्वषट्कारमन्नादं कृत्वा॥

स: । यत् । ऊर्ध्वाम् । दिशम् । अनु । विऽअचलत् । बृहस्पति: । भूत्वा । अनुऽव्यचलत् । वषट्ऽकारम् । अन्नऽअदम् । कृत्वा ॥१४.१७॥

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1 Bhashyas
Meaning
१. (स:) = वह (यत्) = जब (ऊर्ध्वाम्) = उन्नति की सर्वोपरि (दिशं अनुव्यचलत्) = दिशा की ओर चला. तब (बृहस्पतिः भूत्वा अनुव्यचलत्) = ब्रह्मणस्पति-ज्ञान का स्वामी बनकर चला। २. (यः एवं वेद) = जो इस बात को समझ लेता है कि उन्नति के शिखर पर पहुँचने के लिए बृहस्पति बनना आवश्यक है, वह (वषट्कारम्) = [वश् to kill] वासना-विनाश के कार्य को (अन्नादं कृत्वा) = अन्न का खानेवाला करके चलता है, अर्थात् उन्हीं भोजनों को करता है जो वासनाओं को उत्तेजित करनेवाले न हों। यह (वषट्कारेण) = वषट्काररूपी (अन्नादेन) = अन्न खानेवाले से (अन्नं अत्ति) = अन्न को खाता है, अर्थात् भोजन का उद्देश्य वासनाशून्य शक्ति को जन्म देना ही मानता है।
Essence
उन्नति के शिखर पर ज्ञान के द्वारा ही पहुंचा जा सकता है। ज्ञान के मार्ग में वासनाएँ ही विघातक हैं, अत: भोजन वही ठीक है जो वासनाशून्य शक्ति को जन्म दे।
Subject
बृहस्पति वषट्कार अन्नाद