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Atharvaveda - Mantra 14

Atharvaveda 15/14/14

18 Sukta
24 Mantra
15/14/14
Devata- भुरिक् प्राजापत्या अनुष्टुप् Rishi- अध्यात्म अथवा व्रात्य Chhanda- अथर्वा Suktam- अध्यात्म प्रकरण सूक्त
Mantra with Swara
स्व॑धाका॒रेणा॑न्ना॒देनान्न॑मत्ति॒ य ए॒वं वेद॑ ॥

स्व॒धा॒ऽका॒रेण॑ । अ॒न्न॒ऽअ॒देन॑ । अन्न॑म् । अ॒त्ति॒ । य: । ए॒वम् । वेद॑ ॥१४.१४॥

Mantra without Swara
स्वधाकारेणान्नादेनान्नमत्ति य एवं वेद ॥

स्वधाऽकारेण । अन्नऽअदेन । अन्नम् । अत्ति । य: । एवम् । वेद ॥१४.१४॥

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1 Bhashyas
Meaning
१. (स:) = वह (यत्) = जब (पितृृन अनुव्यचलत्) = पितरों को लक्ष्य करके गतिवाला हुआ तो (यमः राजा भूत्वा अनुव्यचलत्) = संयत व दीसजीवनवाला होकर चला। संयत व दीप्ति जीवनवाला बनकर ही तो वह पितरों के समान बन सकेगा। २. (यः एवं वेद) = जो पितरकोटि में प्रवेश के लिए संयम व ज्ञानदीप्ति के महत्त्व को समझता है, वह (स्वधाकारं अन्नादं कृत्वा) = स्वधाकार को अन्नाद बनाकर चलता है, अर्थात् पहले पितरों [बड़ों] को खिलाकर पीछे स्वयं खाता है [पितृभ्यः स्वधा]। यह (अन्नादेन स्वधाकारेण अन्नं अत्ति) = अन्न खानेवाले स्वधाकार से ही अन्न को खाता है, अर्थात् सदा पितृयज्ञ करके अवशिष्ट को ही खानेवाला बनता है।
Essence
पितृयाणमार्ग का सफलता से आक्रमण करने के लिए आवश्यक है कि हम संयत व ज्ञानदीप्तजीवनवाले बनें और पितरों को खिलाकर पितृयज्ञावशिष्ट को ही खाएँ।
Subject
यम: राजा अन्नाद स्वधाकार