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Atharvaveda - Mantra 13

Atharvaveda 15/14/13

18 Sukta
24 Mantra
15/14/13
Devata- आर्ची पङ्क्ति Rishi- अध्यात्म अथवा व्रात्य Chhanda- अथर्वा Suktam- अध्यात्म प्रकरण सूक्त
Mantra with Swara
स यत्पि॒तॄननु॒व्यच॑लद्य॒मो राजा॑ भू॒त्वानु॒व्यचलत्स्वधाका॒रम॑न्ना॒दं कृ॒त्वा ॥

स: । यत् । पि॒तॄन् । अनु॑ । वि॒ऽअच॑लत् । य॒म: । राजा॑ । भू॒त्वा । अ॒नु॒ऽव्य᳡चलत् । स्व॒धा॒ऽका॒रम् । अ॒न्न॒ऽअ॒दम् । कृ॒त्वा ॥१४.१३॥

Mantra without Swara
स यत्पितॄननुव्यचलद्यमो राजा भूत्वानुव्यचलत्स्वधाकारमन्नादं कृत्वा ॥

स: । यत् । पितॄन् । अनु । विऽअचलत् । यम: । राजा । भूत्वा । अनुऽव्यचलत् । स्वधाऽकारम् । अन्नऽअदम् । कृत्वा ॥१४.१३॥

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Meaning
१. (स:) = वह (यत्) = जब (पितृृन अनुव्यचलत्) = पितरों को लक्ष्य करके गतिवाला हुआ तो (यमः राजा भूत्वा अनुव्यचलत्) = संयत व दीसजीवनवाला होकर चला। संयत व दीप्ति जीवनवाला बनकर ही तो वह पितरों के समान बन सकेगा। २. (यः एवं वेद) = जो पितरकोटि में प्रवेश के लिए संयम व ज्ञानदीप्ति के महत्त्व को समझता है, वह (स्वधाकारं अन्नादं कृत्वा) = स्वधाकार को अन्नाद बनाकर चलता है, अर्थात् पहले पितरों [बड़ों] को खिलाकर पीछे स्वयं खाता है [पितृभ्यः स्वधा]। यह (अन्नादेन स्वधाकारेण अन्नं अत्ति) = अन्न खानेवाले स्वधाकार से ही अन्न को खाता है, अर्थात् सदा पितृयज्ञ करके अवशिष्ट को ही खानेवाला बनता है।
Essence
पितृयाणमार्ग का सफलता से आक्रमण करने के लिए आवश्यक है कि हम संयत व ज्ञानदीप्तजीवनवाले बनें और पितरों को खिलाकर पितृयज्ञावशिष्ट को ही खाएँ।
Subject
यम: राजा अन्नाद स्वधाकार