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Atharvaveda - Mantra 12

Atharvaveda 15/14/12

18 Sukta
24 Mantra
15/14/12
Devata- भुरिक् प्राजापत्या अनुष्टुप् Rishi- अध्यात्म अथवा व्रात्य Chhanda- अथर्वा Suktam- अध्यात्म प्रकरण सूक्त
Mantra with Swara
ओष॑धीभिरन्ना॒दीभि॒रन्न॑मत्ति॒ य ए॒वं वेद॑ ॥

ओष॑धीभि: । अ॒न्न॒ऽअ॒दीभि॑: । अन्न॑म् । अ॒त्ति॒ । य: । ए॒वम् । वेद॑ ॥१४.१२॥

Mantra without Swara
ओषधीभिरन्नादीभिरन्नमत्ति य एवं वेद ॥

ओषधीभि: । अन्नऽअदीभि: । अन्नम् । अत्ति । य: । एवम् । वेद ॥१४.१२॥

Meaning
१. (स:) = वह (यत्) = जब (पशुं अनुव्यचलत्) = पशुओं के अनुकूल गतिवाला हुआ-पशुओं को किसी प्रकार की हानि न पहुँचानेवाला बनकर चला तब (रुद्रः भूत्वा अनुव्यचलत्) = [रुत् द्र] रोगों को दूर भगानेवाला बनकर चला। किसी को हानि न पहुँचाना ही अपने को हानि से बचाने का उपाय है। (यः एवं वेद) = जो इस तत्त्व को समझ लेता है कि रोगों से बचने के लिए आवश्यक है कि हम किन्हीं भी पशुओं को हानि न पहुँचाएँ, वह (ओषधी: अन्नादीः कृत्वा) = ओषधियों को ही अन्नभक्षण करनेवाला बनाकर चलता है। दोष-दहन करनेवाले अनों का ही सेवन करता है [उष दाहे+धी] (अन्नादीभिः ओषधीभिः) = अन्नों को खानेवाली दोषदाधकरी स्थिति से ही वह अन्न खाता है।
Essence
हम नीरोग बनने के लिए किसी भी पशु के अहिंसन का व्रत लें। उन्हीं भोजनों को खाएँ जो शरीर के दोषों का दहन करनेवाले हैं।
Subject
रुद्र-अन्नादी ओषधी

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