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Atharvaveda - Mantra 11

Atharvaveda 15/14/11

18 Sukta
24 Mantra
15/14/11
Devata- स्वराट् गायत्री Rishi- अध्यात्म अथवा व्रात्य Chhanda- अथर्वा Suktam- अध्यात्म प्रकरण सूक्त
Mantra with Swara
स यत्प॒शूननु॒व्यच॑लद्रु॒द्रो भू॒त्वानु॒व्यचल॒दोष॑धीरन्ना॒दीः कृ॒त्वा ॥

स: । यत् । प॒शून् । अनु॑ । वि॒ऽअच॑लत् । रु॒द्र: । भू॒त्वा । अ॒नु॒ऽव्य᳡चलत् । ओष॑धी: । अ॒न्न॒ऽअ॒दी: । कृ॒त्वा ॥१४.११॥

Mantra without Swara
स यत्पशूननुव्यचलद्रुद्रो भूत्वानुव्यचलदोषधीरन्नादीः कृत्वा ॥

स: । यत् । पशून् । अनु । विऽअचलत् । रुद्र: । भूत्वा । अनुऽव्यचलत् । ओषधी: । अन्नऽअदी: । कृत्वा ॥१४.११॥

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1 Bhashyas
Meaning
१. (स:) = वह (यत्) = जब (पशुं अनुव्यचलत्) = पशुओं के अनुकूल गतिवाला हुआ-पशुओं को किसी प्रकार की हानि न पहुँचानेवाला बनकर चला तब (रुद्रः भूत्वा अनुव्यचलत्) = [रुत् द्र] रोगों को दूर भगानेवाला बनकर चला। किसी को हानि न पहुँचाना ही अपने को हानि से बचाने का उपाय है। (यः एवं वेद) = जो इस तत्त्व को समझ लेता है कि रोगों से बचने के लिए आवश्यक है कि हम किन्हीं भी पशुओं को हानि न पहुँचाएँ, वह (ओषधी: अन्नादीः कृत्वा) = ओषधियों को ही अन्नभक्षण करनेवाला बनाकर चलता है। दोष-दहन करनेवाले अनों का ही सेवन करता है [उष दाहे+धी] (अन्नादीभिः ओषधीभिः) = अन्नों को खानेवाली दोषदाधकरी स्थिति से ही वह अन्न खाता है।
Essence
हम नीरोग बनने के लिए किसी भी पशु के अहिंसन का व्रत लें। उन्हीं भोजनों को खाएँ जो शरीर के दोषों का दहन करनेवाले हैं।
Subject
रुद्र-अन्नादी ओषधी