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Atharvaveda - Mantra 1

Atharvaveda 15/14/1

18 Sukta
24 Mantra
15/14/1
Devata- त्रिपदानुष्टुप् Rishi- अध्यात्म अथवा व्रात्य Chhanda- अथर्वा Suktam- अध्यात्म प्रकरण सूक्त
Mantra with Swara
स यत्प्राचीं॒दिश॒मनु॒ व्यच॑ल॒न्मारु॑तं॒ शर्धो॑ भू॒त्वानु॒व्यचल॒न्मनो॑ऽन्ना॒दं कृ॒त्वा॥

स: । यत् । प्राची॑म् । दिश॑म् । अनु॑ । वि॒ऽअच॑लत् । मारु॑तम् । शर्ध॑: । भू॒त्वा । अ॒नु॒ऽव्य᳡चलत् । मन॑: । अ॒न्न॒ऽअ॒दम् । कृ॒त्वा ॥१४.१॥

Mantra without Swara
स यत्प्राचींदिशमनु व्यचलन्मारुतं शर्धो भूत्वानुव्यचलन्मनोऽन्नादं कृत्वा॥

स: । यत् । प्राचीम् । दिशम् । अनु । विऽअचलत् । मारुतम् । शर्ध: । भूत्वा । अनुऽव्यचलत् । मन: । अन्नऽअदम् । कृत्वा ॥१४.१॥

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1 Bhashyas
Meaning
१. (स:) = वह व्रात्य (यत्) = जब (प्राचीं दिशं अनुव्यचलत्) = प्रगति [प्र अञ्च] की दिशा में क्रमशः आगे बढ़ा तो (मारुतं शर्धः) = प्राण-सम्बन्धी बल का पुञ्ज (भूत्वा) = होकर, अर्थात् प्राणसाधना द्वारा सबल बनकर (अनुव्यचलत्) = क्रमशः आगे बढ़ा। २. इसके साथ यह (मन: अन्नादं कृत्वा) = मन को अन्नाद बनाकर आगे बढ़ा। मन के दृष्टिकोण से यह भोजन खानेवाला हुआ। (यः एवं वेद) = जो इसप्रकार समझ लेता है कि मन की पवित्रता का निर्भर अन्न पर ही है, [जैसा अन्न वैसा मन, you are, what you eat, आहारशुद्धौ सत्वशुद्धिः] वह (अन्नादेन) = अन्न का ग्रहण करनेवाले (मनसा अन्नं अत्ति) = मन से अन्न खाता है। मन की अपवित्रता के कारणभूत अन्न को नहीं खाता।
Essence
हम प्राणसाधना द्वारा प्राणशक्ति का वर्धन करें और मन की पवित्रता के दृष्टिकोण से सात्विक भोजन ही खाएँ, यही प्रगति की दिशा में आगे बढ़ने का उपाय है।
Subject
मारुतं शर्ध:+अन्नादं मन: