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Atharvaveda - Mantra 5

Atharvaveda 15/12/5

18 Sukta
11 Mantra
15/12/5
Devata- आसुरी गायत्री Rishi- अध्यात्म अथवा व्रात्य Chhanda- अथर्वा Suktam- अध्यात्म प्रकरण सूक्त
Mantra with Swara
प्र पि॑तृ॒याणं॒पन्थां॑ जानाति॒ प्र दे॑व॒यान॑म् ॥

प्र । पि॒तृ॒ऽयान॑म् । पन्था॑म् । जा॒ना॒ति॒ । प्र । दे॒व॒ऽयान॑म् ॥१२.५॥

Mantra without Swara
प्र पितृयाणंपन्थां जानाति प्र देवयानम् ॥

प्र । पितृऽयानम् । पन्थाम् । जानाति । प्र । देवऽयानम् ॥१२.५॥

Meaning
१. (सः) = वह गृहस्थ (य:) = जो (एवम्) = इस गति के स्रोत प्रभु को (विदुषा) = जाननेवाले व्रात्येन व्रतीपुरुष से (अतिसृष्टः) = अनुज्ञा दिया हुआ (जुहोति) = अग्निहोत्र करता है, (प्र पितृयाणं पन्थों जानाति) = पितृयाण मार्ग को जानता है और (देवयानं प्र)[जानाति] = देवयानमार्ग को भी जानता है। बड़ों के आदेश में चलना ही पितृयाणमार्ग है और दिव्यगुणों को प्राप्त करानेवाला मार्ग ही देवयान है। घर पर आये हुए मान्य अतिथि से अनुज्ञा लेकर अग्निहोत्र आदि में प्रवृत्त होने से घर में पितयाण व देवयान मार्गों की नींव पड़ती है। २. (य:) = जो (एवं विदुषा) = गति के स्रोत प्रभु के ज्ञाता व्रात्य से (अतिसृष्टः जुहोति) = अनुज्ञा दिया हुआ अग्निहोत्र करता है, वह (देवेषु) = देवों के विषय में (न आवश्चते) = अपने कर्तव्य को क्षीण नहीं करता, अर्थात् उनके विषय में अपने कर्तव्य का पालन करता है (अस्य हुतं भवति) = इसका अग्निहोत्र ठीक सम्पन्न होता है तथा (अस्मिन् लोके) = इस जगत् में (अस्य आयतनम्) = इसका घर (परिशिष्यते) = विनाश से बचा रहता है, अर्थात् इस घर में विलास आदि की वृत्तियों उत्पन्न होकर इसके विनाश का कारण नहीं बनती।
Essence
विद्वान व्रती अतिथि से अनुजा लेकर ही अग्निहोत्र आदि में प्रवत्त होने से उस अतिथि का मान बना रहता है और गृहस्थ के घर में उत्तम प्रथाएँ बनी रहती हैं जो घर को विनष्ट नहीं होने देती।
Subject
अतिथि सत्कार व गृहरक्षण

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