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Atharvaveda - Mantra 10

Atharvaveda 15/12/10

18 Sukta
11 Mantra
15/12/10
Devata- आसुरी गायत्री Rishi- अध्यात्म अथवा व्रात्य Chhanda- अथर्वा Suktam- अध्यात्म प्रकरण सूक्त
Mantra with Swara
आ दे॒वेषु॑वृश्चते अहु॒तम॑स्य भवति ॥

आ । दे॒वेषु॑ । वृ॒श्च॒ते॒ । अ॒हु॒तम् । अ॒स्य॒ । भ॒व॒ति॒ ॥१२.१०॥

Mantra without Swara
आ देवेषुवृश्चते अहुतमस्य भवति ॥

आ । देवेषु । वृश्चते । अहुतम् । अस्य । भवति ॥१२.१०॥

Meaning
१. (अथ) = अब (यः) = जो (एवं विदुषा) = इसप्रकार ज्ञानी (व्रात्येन) = व्रती से (अनतिसृष्टः) = बिना अनुज्ञा पाये ही, उसके आतिथ्य को उपेक्षित करके (जुहोति) = यज्ञ में प्रवृत्त होता है, वह पितृयाणं पन्यां न प्रजानाति-पितृयाणमार्ग के तत्व को नहीं जानता न देवयानं प्र [जानाति]-न ही देवयानमार्ग के रहस्य को जानता है। २. (य:) = जो एवं विदुषा (व्रात्येन) = इसप्रकार ज्ञानीव्रती से (अनतिसष्ट:) = बिना अनुज्ञा प्राप्त किये हुए ही (जुहोति) = अग्निहोत्र में प्रवृत्त हो जाता है, वह (देवेषु) = देवों के विषय में (आवृश्चते) = अपने कर्त्तव्य को छिन्न करता है। (आहुतम् अस्य भवति) = इसका अग्निहोत्र किया न किया बराबर हो जाता है और (अस्मिन् लोके) = इस संसार में (अस्य आयतनम्) = इसका घर उत्तम परिपाटियों के न रहने से (नशिष्यते) = विनष्ट हो जाता है।
Essence
अतिथि की उपेक्षा करके यज्ञ में लगे रहना भी उचित नहीं, इससे घर में बड़ों के आदर की भावना का विलोप होकर घर विनाश की ओर चला जाता है।
Subject
बड़ों का निरादर व गृहविनाश

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