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Atharvaveda - Mantra 2

Atharvaveda 15/1/2

18 Sukta
8 Mantra
15/1/2
Devata- द्विपदा साम्नी बृहती Rishi- अध्यात्म अथवा व्रात्य Chhanda- अथर्वा Suktam- अध्यात्म प्रकरण सूक्त
Mantra with Swara
स प्र॒जाप॑तिःसु॒वर्ण॑मा॒त्मन्न॑पश्य॒त्तत्प्राज॑नयत् ॥

स: । प्र॒जाऽप॑ति: । सु॒ऽवर्ण॑म् । आ॒त्मन् । अ॒प॒श्य॒त् । तत् । प्र । अ॒ज॒न॒य॒त् ॥१.२॥

Mantra without Swara
स प्रजापतिःसुवर्णमात्मन्नपश्यत्तत्प्राजनयत् ॥

स: । प्रजाऽपति: । सुऽवर्णम् । आत्मन् । अपश्यत् । तत् । प्र । अजनयत् ॥१.२॥

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1 Bhashyas
Meaning
१. (व्रात्यः) = व्रतसमूह का पालन करनेवाला यह व्रतीपुरुष (इयमानः एव आसीत्) = गतिशील ही था, यह कभी अकर्मण्य नहीं हुआ। (स:) = वह व्रात्य (प्रजापतिं समैरयत्) = अपने हृदयदेश में प्रजापति प्रभु की भावना को प्रेरित करता था। इसने हदय में प्रभु का चिन्तन किया। वस्तुतः प्रभु-स्मरणपूर्वक क्रिया होने पर क्रिया में अपवित्रता नहीं आती। २. (सः प्रजापतिः) = उस प्रजापति प्रभु ने सुवर्णम्-प्रभु गुणों का सम्यक् वर्णन करनेवाले इस ज्ञानी को (आत्मन् अपश्यत्) = अपनी गोद में बैठा देखा। ब्रह्मनिष्ठ होकर ही तो यह व्रात्य सब कर्मों को कर रहा था, (तत्) = अत: (प्राजनयत्) = प्रभु ने इस व्रात्य के जीवन का विकास किया। इसे उत्तम गुणों से युक्त जीवनवाला मनाया।
Essence
व्रतमय जीवनवाला यह साधक क्रियाशील हुआ। इसने हृदय में प्रभु की भावना को प्रेरित किया। प्रभु ने इस आत्मनिष्ठ व्रात्य के गुणों का विकास किया।
Subject
इयमान व्रात्य