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Atharvaveda - Mantra 51

Atharvaveda 14/2/51

2 Sukta
75 Mantra
14/2/51
Devata- अनुष्टुप् Rishi- आत्मा Chhanda- सवित्री, सूर्या Suktam- विवाह प्रकरण सूक्त
Mantra with Swara
ये अन्ता॒याव॑तीः॒ सिचो॒ य ओत॑वो॒ ये च॒ तन्त॑वः। वासो॒ यत्पत्नी॑भिरु॒तं तन्नः॑स्यो॒नमुप॑ स्पृशात् ॥

ये । अन्ता॑: । याव॑ती: । सिच॑: । ये । ओत॑व: । ये । च॒ । तन्त॑व: । वास॑: । यत् । पत्नी॑भि: । उ॒तम् । तत् । न॒: । स्यो॒नम् । उप॑ । स्पृ॒शा॒त् ॥२.५१॥

Mantra without Swara
ये अन्तायावतीः सिचो य ओतवो ये च तन्तवः। वासो यत्पत्नीभिरुतं तन्नःस्योनमुप स्पृशात् ॥

ये । अन्ता: । यावती: । सिच: । ये । ओतव: । ये । च । तन्तव: । वास: । यत् । पत्नीभि: । उतम् । तत् । न: । स्योनम् । उप । स्पृशात् ॥२.५१॥

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1 Bhashyas
Meaning
१. (ये अन्त:) = जो वस्त्रों की झालरें हैं, (यावती: सिच:) = जितनी किनारियौं हैं, (ये ओतव:) = जो उनके बाने हैं (च) = और (ये तन्तव:) = जो ताने के सूत्र हैं, इस प्रकार (यत् वास:) = जो वस्त्र (पत्नीभिः उतम्) = गृहदेवियों ने ही बुना है, (तत्) = वह (स्योनम्) = सुखकर वस्त्र ही (न: उपस्पृशात्) = हमारे शरीर को छूए। २. स्त्रियों का अतिरिक्त समय वस्त्र-निर्माण में व्यतीत होकर उन्हें भोगविलास की बृत्ति से ऊपर उठनेवाला बनाए। इसप्रकार प्रत्येक युवति देश के ऐश्वर्य की वृद्धि में भी कुछ न-कुछ सहायक हो रही होगी और समय को भी उत्तमता से व्यतीत कर पाएगी। वस्तुत: इन वस्त्रों के एक-एक तार में प्रेम भी ग्रथित हुआ-हुआ होता है। उस वस्त्र को धारण करके प्रेम की पवित्र भावना में भी वृद्धि होती है। यान्त्रिक वस्त्र 'मृत'-सा होता है तो यह 'जीवित' होता है। यान्त्रिक वस्त्रों में केवल 'सौन्दर्य' है तो गृह के वस्त्र में प्रेममय सौन्दर्य है।
Essence
गृहिणियाँ अपने अतिरिक्त समय का घर के वस्त्रों के निर्माण में सदुपयोग करें। इसप्रकार वे ऐश्वर्य-वृद्धि में व विलासवृत्ति-विनाश में सहायक बनेगी।
Subject
गृह में ही वस्त्र निर्माण