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Atharvaveda - Mantra 15

Atharvaveda 14/2/15

2 Sukta
75 Mantra
14/2/15
Devata- भुरिक् अनुष्टुप् Rishi- आत्मा Chhanda- सवित्री, सूर्या Suktam- विवाह प्रकरण सूक्त
Mantra with Swara
प्रति॑ तिष्ठवि॒राड॑सि॒ विष्णु॑रिवे॒ह स॑रस्वति। सिनी॑वालि॒ प्र जा॑यतां॒ भग॑स्यसुम॒ताव॑सत् ॥

प्रति॑ । ति॒ष्ठ॒ । व‍ि॒ऽराट् । अ॒सि॒ । विष्णु॑ऽइव । इ॒ह । स॒र॒स्व॒ति॒ । सिनी॑वालि । प्र । जा॒य॒ता॒म् । भग॑स्य । सु॒ऽम॒तौ । अ॒स॒त् ॥१.१५॥

Mantra without Swara
प्रति तिष्ठविराडसि विष्णुरिवेह सरस्वति। सिनीवालि प्र जायतां भगस्यसुमतावसत् ॥

प्रति । तिष्ठ । व‍िऽराट् । असि । विष्णुऽइव । इह । सरस्वति । सिनीवालि । प्र । जायताम् । भगस्य । सुऽमतौ । असत् ॥१.१५॥

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1 Bhashyas
Meaning
१. हे (सरस्वति) = ज्ञानजल को धारण करनेवाली गृहपत्नि! तू (इह प्रतितिष्ठ) = इस गृह में प्रतिष्ठित हो, तू सबसे मान प्राप्त कर । (विराट् असि) = तू विशिष्ट ही दीतिबाली है-तेरी शोभा निराली है। तु (विष्णः इव) = देदीप्यमान सूर्य की भाँति है [आदित्यानामहं विष्णुः]। २. हे सिनीवालि प्रशस्त अन्नोंवाली-सदा सात्त्विक अन्नों का सेवन करनेवाली गृहपनि! तेरी सुव्यवस्था से यह गृहपति (प्रजायताम्) = सन्तान के रूप में जन्म लेनेवाला हो [तद्धि जायाया जायात्वं यदस्यां जायते पुनः।] इसका पति (भगस्य) = ऐश्वर्यशाली भजनीय प्रभु की (सुमतौ असत्) = कल्याणी मति में सदा निवास करे। प्रभु-प्रेरणा को प्रास करता हुआ, सुपथ से धर्नाजन करनेवाला हो।
Essence
घर में गृहपत्नी का समुचित मान हो। वह घर में सूर्य की भाँति दीस हो। प्रशस्त अत्रों का सेवन करनेवाली हो, उत्तम सन्तान को जन्म दे। इसका गृहपति भी प्रभु-प्रेरणा को सुनता हुआ सुपथ से धर्नाजन करनेवाला हो।
Subject
सरस्वती सिनीवाली