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Atharvaveda - Mantra 10

Atharvaveda 14/2/10

2 Sukta
75 Mantra
14/2/10
Devata- अनुष्टुप् Rishi- यक्ष्मनाशनी Chhanda- सवित्री, सूर्या Suktam- विवाह प्रकरण सूक्त
Mantra with Swara
येव॒ध्वश्च॒न्द्रं व॑ह॒तुं यक्ष्मा॑ यन्ति॒ जनाँ॒ अनु॑। पुन॒स्तान्य॒ज्ञिया॑दे॒वा न॑यन्तु॒ यत॒ आग॑ताः ॥

ये । व॒ध्व᳡: । च॒न्द्रम् । व॒ह॒तुम् । यक्ष्मा॑: । यन्ति॑ । जना॑न् । अनु॑ । पुन॑: । तान् । य॒ज्ञिया॑: । दे॒वा: । नय॑न्तु । यत॑: । आऽग॑ता: ॥१.१०।

Mantra without Swara
येवध्वश्चन्द्रं वहतुं यक्ष्मा यन्ति जनाँ अनु। पुनस्तान्यज्ञियादेवा नयन्तु यत आगताः ॥

ये । वध्व: । चन्द्रम् । वहतुम् । यक्ष्मा: । यन्ति । जनान् । अनु । पुन: । तान् । यज्ञिया: । देवा: । नयन्तु । यत: । आऽगता: ॥१.१०।

Meaning
१.(ये यक्ष्मा) = जो रोग (जनान् अनु) = मनुष्यों को प्राप्त होने के (पश्चात् वध्वः चन्द्रं वहतुम्) = वधू के आहादमय, सुन्दर शरीर-रथ को भी (यन्ति) = प्राप्त होते हैं, (तान्) = उन रोगों को (यज्ञियाः देवा:) = आदरणीय विद्वान् पुरुष (पुन:) = फिर वहाँ (नयन्तु) = प्राप्त कराएँ, (यतः आगताः) = जहाँ से कि ये आये थे। २. पुरुष का जीवन कुछ भी भोगप्रधान हुआ तो शरीर में 'यक्ष्मा' का प्रवेश हो जाता है। पुरुष से यह रोग वधू को भी प्राप्त हो जाता है। आदरणीय विद्वान् अतिथियों का 1यह कर्तव्य होता है कि जिस कारण से ये रोग उत्पन्न होते हैं उनका ठीक से ज्ञान देकर उन कारणों को दूर करने के लिए प्रेरित करें। मुख्य बात यही है कि पति-पत्नी का जीवन भोगप्रधान न हो जाए।
Essence
मनुष्य भोगप्रवण होते ही रोगों को आमन्त्रित करता है। ये रोग पत्नी को भी प्राप्त हो जाते हैं। घर में अतिथिरूपेण आने-जानेवाले विद्वानों का कर्तव्य होता है कि वे रोग कारणों का ज्ञान देकर रोगों को दूर करने में सहायक हों।
Subject
रोगनिवारण

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