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Atharvaveda - Mantra 61

Atharvaveda 14/1/61

2 Sukta
64 Mantra
14/1/61
Devata- त्रिष्टुप् Rishi- आत्मा Chhanda- सवित्री, सूर्या Suktam- विवाह प्रकरण सूक्त
Mantra with Swara
सु॑किंशु॒कंव॑ह॒तुं वि॒श्वरू॑पं॒ हिर॑ण्यवर्णं सु॒वृतं॑ सुच॒क्रम्। आ रो॑ह सूर्येअ॒मृत॑स्य लो॒कं स्यो॒नं पति॑भ्यो वह॒तुं कृ॑णु॒ त्वम् ॥

सु॒ऽकिं॒शु॒कम् । व॒ह॒तुम् । वि॒श्वऽरू॑पम् । हिर॑ण्यऽवर्णम् । सु॒ऽवृत॑म् । सु॒ऽच॒क्रम् । आ । रो॒ह॒ । सू॒र्ये॒॑ । अ॒मृत॑स्य । लो॒कम् । स्यो॒नम् । पति॑ऽभ्य: । व॒ह॒तुम् । कृ॒णु॒ । त्वम् ॥१.६१॥

Mantra without Swara
सुकिंशुकंवहतुं विश्वरूपं हिरण्यवर्णं सुवृतं सुचक्रम्। आ रोह सूर्येअमृतस्य लोकं स्योनं पतिभ्यो वहतुं कृणु त्वम् ॥

सुऽकिंशुकम् । वहतुम् । विश्वऽरूपम् । हिरण्यऽवर्णम् । सुऽवृतम् । सुऽचक्रम् । आ । रोह । सूर्ये । अमृतस्य । लोकम् । स्योनम् । पतिऽभ्य: । वहतुम् । कृणु । त्वम् ॥१.६१॥

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Meaning
१. हे सूर्य-सविता की पुत्री सूर्यसम दीस जीवनवाली सरणशीले! तू (आरोह) = इस गृहस्थ रथ पर आरूढ़ हो, जो रथ (सुकिंशुकम्) = उत्तम प्रकाशवाला है, जिसे तूने स्वाध्याय के द्वारा उत्तम प्रकाश से युक्त करना है। (वहतुम्) = जो हमें उद्दिष्ट स्थल की ओर ले-जानेवाला है। (विश्वरूपम्) = जो सर्वत्र प्रविष्ट प्रभु का निरूपण करनेवाला है, चमकता है। यहाँ सबका स्वास्थ्य उत्तम होने से सब चमकते हैं। (सवृतम्) = यह रथ उत्तम वर्तनवाला है। यहाँ सबकी वृत्ति उत्तम है तथा (सुचक्रम्) = यह रथ उत्तम चक्रवाला है, अर्थात् सब उत्तम कर्मों में प्रवृत्त हैं। २. हे सूर्ये! (त्वम्) = तू इस (बहतुम्) = रथ को पतिभ्यः सब पतिकुलवालों के लिए (अमृतस्य लोकम्) = नीरोगता का स्थान तथा स्योनं कृणु-सुखप्रद कर । तेरे उत्तम व्यवहार व प्रबन्ध से यहाँ सब नीरोग और सुखी रहें।
Essence
गृहपत्नी ने घर में ऐसी व्यवस्था करनी है कि वहाँ सभी स्वाध्यायशील हों, प्रभु स्तवन की वृत्तिवाले हों, स्वास्थ्य की ज्योति से चमकते हों, उत्तम वृत्तिवाले व उत्तम कौवाले हों, घर में नीरोगता व सुख हो।
Subject
गृहस्थ-रथ