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Atharvaveda - Mantra 5

Atharvaveda 14/1/5

2 Sukta
64 Mantra
14/1/5
Devata- अनुष्टुप् Rishi- सोम Chhanda- सवित्री, सूर्या Suktam- विवाह प्रकरण सूक्त
Mantra with Swara
आ॒च्छद्वि॑धानैर्गुपि॒तो बार्ह॑तैः सोमः रक्षि॒तः। ग्राव्णा॒मिच्छृ॒ण्वन्ति॑ष्ठसि॒न ते॑ अश्नाति॒ पार्थि॑वः ॥

आ॒ऽच्छत्ऽवि॑धानै: । गु॒पि॒त: । बार्ह॑तै: । सो॒म॒ । र॒क्षि॒त: । ग्राव्णा॑म् । इत् । शृ॒ण्वन् । ति॒ष्ठ॒सि॒ । न । ते॒ । अ॒श्ना॒ति॒ । पार्थि॑व: ॥१.५॥

Mantra without Swara
आच्छद्विधानैर्गुपितो बार्हतैः सोमः रक्षितः। ग्राव्णामिच्छृण्वन्तिष्ठसिन ते अश्नाति पार्थिवः ॥

आऽच्छत्ऽविधानै: । गुपित: । बार्हतै: । सोम । रक्षित: । ग्राव्णाम् । इत् । शृण्वन् । तिष्ठसि । न । ते । अश्नाति । पार्थिव: ॥१.५॥

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1 Bhashyas
Meaning
१. (आच्छत् विधानैः) = समन्तात् आवरण के उपायों से सब ओर से आक्रमण करनेवाली वासनाओं को दूर रखने के उपायों से (गुपितः) = यह सोम सुरक्षित हुआ है। (बार्हतैः) = वासनाओं के उबईणों, समूल विनाशों के द्वारा (सोमः रक्षितः) = सोम शरीर में रक्षित होता है। धान्य के रक्षण के लिए घास-फूस का उद्बर्हण आवश्क होता है, इसीप्रकार सोम के रक्षण के लिए वासनाओं का हृदयक्षेत्र से उबर्हण आवश्यक है। २. हे सोम! तू (इत्) = निश्चय से (ग्राव्णाम्) = ज्ञानी स्तोताओं की ज्ञान-चर्चाओं को (शृण्वन्) = सुनता हुआ (तिष्ठसि) = शरीर में स्थित होता है। जो मनुष्य ज्ञानप्रधान जीवन बिताता है, यह सोम उसकी ज्ञानाग्नि का ईधन बनकर उसकी ज्ञानाग्नि को दीस करता है। एवं, शरीर में उपयुक्त हुआ-हुआ यह सोम नष्ट नहीं होता, पार्थिवः ते न अश्नाति हे सोम! पार्थिव भोगों में आसक्त पुरुष तेरा सेवन नहीं करता। भोगासक्ति सोमरक्षा की विरोधिनी
Essence
सोम-रक्षण के लिए वासनाओं आ का उद्बर्हणवश्यक है, उसके लिए ज्ञानप्रवणता उत्तम साधन है।
Subject
वासनाओं का उद्बर्हण व ज्ञानप्रवणता