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Atharvaveda - Mantra 41

Atharvaveda 14/1/41

2 Sukta
64 Mantra
14/1/41
Devata- सोम Rishi- आत्मा Chhanda- सवित्री, सूर्या Suktam- विवाह प्रकरण सूक्त
Mantra with Swara
खे रथ॑स्य॒ खेऽन॑सः॒ खे यु॒गस्य॑ शतक्रतो। अ॑पा॒लामि॑न्द्र॒ त्रिष्पू॒त्वाकृ॑णोः॒सूर्य॑त्वचम् ॥

खे । रथ॑स्य । खे । अन॑स: । खे । यु॒गस्य॑ । श॒त॒क्र॒तो॒ इति॑ शतक्रतो । अ॒पा॒लाम् । इ॒न्द्र॒ । त्रि: । पू॒त्वा । अकृ॑णो: । सूर्य॑ऽत्ववचम् ॥१.४१॥

Mantra without Swara
खे रथस्य खेऽनसः खे युगस्य शतक्रतो। अपालामिन्द्र त्रिष्पूत्वाकृणोःसूर्यत्वचम् ॥

खे । रथस्य । खे । अनस: । खे । युगस्य । शतक्रतो इति शतक्रतो । अपालाम् । इन्द्र । त्रि: । पूत्वा । अकृणो: । सूर्यऽत्ववचम् ॥१.४१॥

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1 Bhashyas
Meaning
१. हे (शतक्रतो) = अनन्त प्रज्ञान व शक्तिवाले प्रभो! (रथस्य खे) = शरीररूप रथ के छिद्र में (अनसः खे) = [अन प्राणने], प्राणमयकोश के छिद्र में-इन्द्रियों के छिद्र में [प्राणा: वाव इन्द्रियाणि] (युगस्य खे) = आत्मा व इन्द्रियों को परस्पर जोड़नेवाले मन के छिद्र में, हे (इन्द्र) = सब शत्रुओं के विद्रावक प्रभो! इस (अपालाम्) = [अप अलम्]-दोषों का सुदूर वारण करने के लिए यत्नशील युवति को (त्रिः पूत्वा) = तीन प्रकार से पवित्र करके-शरीर, इन्द्रियों व मन में पवित्र व निर्दोष बनाकर (सूर्यत्वचम् अकृणो:) = आप सूर्यसम दीप्त त्वचावाला बनाते हैं, इसे नितराम तेजस्वी बनाते हैं। २. शरीर, इन्द्रियों व मन के दोषों का निराकरण होने पर जीवन तेजस्वी व पवित्र बनता ही है। शरीर के दोष रोग हैं, इन्द्रियों के दोष विषयसंग हैं तथा मन का दोष राग-द्वेष परिपूर्णता है। प्रभु अपाला के इन सब दोषों को दूर करते हैं।
Essence
प्रभुकृपा से हमारे राष्ट्र में युवतियाँ 'शरीर, इन्द्रियों व मन' के दोषों से रहित होकर सूर्यसम दीप्त त्वचावाली हों।
Subject
दोष-निराकरण