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Atharvaveda - Mantra 4

Atharvaveda 13/2/4

4 Sukta
46 Mantra
13/2/4
Devata- रोहितः, आदित्यः, अध्यात्मम् Rishi- ब्रह्मा Chhanda- त्रिष्टुप् Suktam- अध्यात्म सूक्त
Mantra with Swara
वि॑प॒श्चितं॑ त॒रणिं॒ भ्राज॑मानं॒ वह॑न्ति॒ यं ह॒रितः॑ स॒प्त ब॒ह्वीः। स्रु॒ताद्यमत्त्रि॒र्दिव॑मुन्नि॒नाय॒ तं त्वा॑ पश्यन्ति परि॒यान्त॑मा॒जिम् ॥

वि॒प॒:ऽचित॑म् । त॒रणि॑म् । भ्राज॑मानम् । वह॑न्ति । यम् । ह॒रित॑: । स॒प्त । ब॒ह्वी: । स्रु॒तात् । यम् । अत्त्रि॑: । दिव॑म् । उ॒त्ऽनि॒नाय॑ । तम् । त्वा॒ । प॒श्य॒न्ति॒ । प॒रि॒ऽयान्त॑म् । आ॒जिम् ॥2.४॥

Mantra without Swara
विपश्चितं तरणिं भ्राजमानं वहन्ति यं हरितः सप्त बह्वीः। स्रुताद्यमत्त्रिर्दिवमुन्निनाय तं त्वा पश्यन्ति परियान्तमाजिम् ॥

विप:ऽचितम् । तरणिम् । भ्राजमानम् । वहन्ति । यम् । हरित: । सप्त । बह्वी: । स्रुतात् । यम् । अत्त्रि: । दिवम् । उत्ऽनिनाय । तम् । त्वा । पश्यन्ति । परिऽयान्तम् । आजिम् ॥2.४॥

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1 Bhashyas
Meaning
१.(विपश्चितम्) = सबको देखनेवाले (तरणिम्) = अन्धकार से तरानेवाले (भ्राजमानम्) = देदीप्यमान (यम्) = जिस सूर्य को (सप्त बह्वी: हरित:) = सात रंगोंवाली अनेक किरणें (वहन्ति) = सर्वत्र प्रास कराती हैं, (यम्) = जिसको (अत्रि:) = [अ अत्रि] त्रिगुणातीत प्रभु स्(त्रुतात्) = सुत के हेतु से-आकाश से वृष्टि जल के वर्षण के हेतु से (दिवम् उन्निनाय) = द्युलोक में प्राप्त कराते हैं, (तं त्वा) = उस तुझ सूर्य को (आजिम् परियान्तम्) = [race-course, road-way] मार्ग पर गति करते हुए को (पश्यन्ति) = ज्ञानी लोग देखते हैं। २. ज्ञानी पुरुष सूर्य में प्रभु की महिमा को देखते हुए आश्चर्य करते हैं कि [क] किस प्रकार यह दीप्त सुर्य करोड़ों किलोमीटरों तक अन्धकार को समाप्त कर देता है, [ख] इसकी सात रंगों में विभक्त अनन्त किरणें किस प्रकार विविध प्राणशक्तियों का हममें संचार कर रही हैं, [ग] किस प्रकार यह सूर्य दृष्टि का हेतु बनकर सब अन्नों का उत्पादक बनता है, [घ] किस प्रकार यह सूर्य अपने मार्ग पर आकृष्ट लोकसमूह के साथ आगे बढ़ रहा है।
Essence
ज्ञानी पुरुष मार्ग पर आगे बढ़ते हुए अपने प्रकाश से अन्धकार को दूर करते हए सप्त वर्ण की किरणों से प्राणदायी तत्वों का संचार करते हुए वृष्टि का हेतु बनते हुए सूर्य को देखते हैं और प्रभु की महिमा का स्मरण करते हैं।

 
Subject
'आजिम् परियान्तम्' [सूर्यम्]