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Atharvaveda - Mantra 37

Atharvaveda 13/2/37

4 Sukta
46 Mantra
13/2/37
Devata- रोहितः, आदित्यः, अध्यात्मम् Rishi- ब्रह्मा Chhanda- पञ्चपदा विराड्जगती Suktam- अध्यात्म सूक्त
Mantra with Swara
दि॒वस्पृ॒ष्ठे धाव॑मानं सुप॒र्णमदि॑त्याः पु॒त्रं ना॒थका॑म॒ उप॑ यामि भी॒तः। स नः॑ सूर्य॒ प्र ति॑र दी॒र्घमायु॒र्मा रि॑षाम सुम॒तौ ते॑ स्याम ॥

दि॒व: । पृ॒ष्ठे । धाव॑मानम्‌ । सु॒ऽप॒र्णम् । अदि॑त्या: । पु॒त्रम् । ना॒थऽका॑म: । उप॑ । या॒मि॒ । भी॒त: । स: । न॒: । सू॒र्य॒ । प्र । ति॒र॒ । दी॒र्घम् । आयु॑: । मा । रि॒षा॒म॒ । सु॒ऽम॒तौ । ते॒ । स्या॒म॒ ॥२.३७॥

Mantra without Swara
दिवस्पृष्ठे धावमानं सुपर्णमदित्याः पुत्रं नाथकाम उप यामि भीतः। स नः सूर्य प्र तिर दीर्घमायुर्मा रिषाम सुमतौ ते स्याम ॥

दिव: । पृष्ठे । धावमानम्‌ । सुऽपर्णम् । अदित्या: । पुत्रम् । नाथऽकाम: । उप । यामि । भीत: । स: । न: । सूर्य । प्र । तिर । दीर्घम् । आयु: । मा । रिषाम । सुऽमतौ । ते । स्याम ॥२.३७॥

Meaning
१. (दिवः पृष्ठे) = ज्ञान के आधार में (धावमानम्) = हम सबके जीवनों को शुद्ध करते हुए [धाव् शुद्धौ] (सुपर्णम्) = उत्तमता से हमारा पालन करते हुए (अदित्याः पुत्रम्) = वेदवाणी के द्वारा [अ दिति-अखण्डिता वाक्] हमें पवित्र व रक्षित करनेवाले [पुनाति, त्रायते] प्रभु को (भीत:) = संसार के इन काम-क्रोधरूप शत्रुओं से भयभीत हुआ-हुआ मैं (नाथकाम:) = नाथ को, रक्षक को चाहता हुआ (उपयामि) = समीपता से प्राप्त होता हूँ। २.हे सूर्य-उत्तम कर्मों में प्रेरित करनेवाले प्रभो! (स:) = वे आप (नः) = हमारे लिए (दीर्घम् आयु:) = दीर्घजीवन को प्रतिर अत्यन्त बढ़ानेवाले होओ। (मा रिषाम) = हम हिंसित न हों। (ते सुमतौ स्याम) = सदा आपकी कल्याणी मति में निवास करें।
Essence
प्रभु ज्ञान द्वारा हमारा शोधन करते हैं। प्रभु की कल्याणी मति में चलते हुए हम दीर्घ आयुष्य को प्राप्त करते हैं।

 
Subject
'अदिति-पुत्र' प्रभु

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