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Atharvaveda - Mantra 30

Atharvaveda 13/2/30

4 Sukta
46 Mantra
13/2/30
Devata- रोहितः, आदित्यः, अध्यात्मम् Rishi- ब्रह्मा Chhanda- पञ्चपदोष्णिग्बृहतीगर्भातिजगती Suktam- अध्यात्म सूक्त
Mantra with Swara
रोच॑से दि॒वि रोच॑से अ॒न्तरि॑क्षे॒ पत॑ङ्ग पृथि॒व्यां रो॑चसे॒ रोच॑से अ॒प्स्वन्तः। उ॒भा स॑मु॒द्रौ रुच्या॒ व्यापिथ दे॒वो दे॑वासि महि॒षः स्व॒र्जित् ॥

रोच॑से । दि॒वि । रोच॑से । अ॒न्तरि॑क्षे । पत॑ङ् । पृ॒थि॒व्याम् । रोच॑से । रोच॑से । अ॒प्ऽसु । अ॒न्त: । उ॒भा । स॒मु॒द्रौ । रुच्या॑ । वि । आ॒पि॒थ॒ । दे॒व: । दे॒व । अ॒सि॒ । म॒हि॒ष: । स्व॒:ऽजित् ॥२.३०॥

Mantra without Swara
रोचसे दिवि रोचसे अन्तरिक्षे पतङ्ग पृथिव्यां रोचसे रोचसे अप्स्वन्तः। उभा समुद्रौ रुच्या व्यापिथ देवो देवासि महिषः स्वर्जित् ॥

रोचसे । दिवि । रोचसे । अन्तरिक्षे । पतङ् । पृथिव्याम् । रोचसे । रोचसे । अप्ऽसु । अन्त: । उभा । समुद्रौ । रुच्या । वि । आपिथ । देव: । देव । असि । महिष: । स्व:ऽजित् ॥२.३०॥

Meaning
१. हे (पतङ्ग) = [पत गतौ, ऐश्वर्य च] ऐश्वर्य के साथ गतिवाले प्रभो! आप (दिवि रोचसे) = द्युलोक में दीप्त होते हो-द्युलोक में सूर्य के रूप में आपकी महिमा का प्रकाश होता है। अन्तरिक्षे रोचसे-अन्तरिक्ष में आप दीप्त होते हैं-'चन्द्र, विद्युत, वायु' आदि देवों में आपकी महिमा का प्रकाश है। (पृथिव्यां रोचसे) = पृथिवीस्थ अग्नि आदि देवों में भी आपकी ही दीप्ति दीप्त हो रही है। [तेजसवास्मि विभावसौ]। (अप्सु अन्त: रोचसे) = जलों के अन्दर भी आप ही दीस हो रहे हैं। 'अप्स' का अर्थ 'प्रजाओं में यह भी है-सब प्रजाओं में प्रभु का ही प्रकाश दिखता है। २. (उभा समुद्रौ) = पृथिवीस्थ समुद्रों को तथा अन्तरिक्षस्थ मेघरूप' समद्रों को (रुच्या व्यापिथ) = दीप्त से आप व्यास कर रहे हो। हे देव-प्रकाशमय प्रभो! (देवः असि) = आप सचमुच देव हैं। (महिष:) = पूजनीय हैं-पूजा के योग्य हैं। (स्वर्जित) = हमारे लिए प्रकाश व सुख का विजय करनेवाले हैं।
Essence
प्रभु का प्रकाश व महिमा सर्वत्र दीस है। हमारे हृदयों में भी प्रभुदीस हो रहे हैं। प्रभुस्मरण करते हुए हम 'देव' बनें। दैवीवृत्तिवाले बनकर महनीय जीवनवाले हों। इसप्रकार प्रकाशमय लोक का विजय करें।
Subject
देवः, महिषः, स्वर्जित्

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