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Atharvaveda - Mantra 29

Atharvaveda 13/2/29

4 Sukta
46 Mantra
13/2/29
Devata- रोहितः, आदित्यः, अध्यात्मम् Rishi- ब्रह्मा Chhanda- बार्हतगर्भानुष्टुप् Suktam- अध्यात्म सूक्त
Mantra with Swara
बण्म॒हाँ अ॑सि सूर्य॒ बडा॑दित्य म॒हाँ अ॑सि। म॒हांस्ते॑ मह॒तो म॑हि॒मा त्वमा॑दित्य म॒हाँ अ॑सि ॥

बट् । म॒हान् । अ॒सि॒ । सू॒र्य॒ । बट् । आ॒दि॒त्य॒ । म॒हान् । अ॒सि॒ । म॒हान् । ते॒ । म॒ह॒त: । म॒हि॒मा । त्वम् । आ॒दि॒त्य॒ । म॒हान् । अ॒सि॒॥२.२९॥

Mantra without Swara
बण्महाँ असि सूर्य बडादित्य महाँ असि। महांस्ते महतो महिमा त्वमादित्य महाँ असि ॥

बट् । महान् । असि । सूर्य । बट् । आदित्य । महान् । असि । महान् । ते । महत: । महिमा । त्वम् । आदित्य । महान् । असि॥२.२९॥

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Meaning
१.हे (सूर्य) = निरन्तर गतिशील [सरति] व सबको कार्य में प्रेरित करनेवाले [सुवति कर्मणि] सूर्य! तू (बट्) = सचमुच ही (महान् असि) = महान् है, महनीय है। हे (आदित्य) = किरणों द्वारा जलों का आदान करनेवाले आदित्य ! तू (बट्) = सचमुच (महान्) = महनीय है-प्रभु की महिमा का तुझमें प्रकाश हो रहा है [तेजसा रविरंशुमान्] । तू तेजस्वी पदार्थों में प्रभु की विभूति ही है। २. (महतः ते) = महनीय तेरी महिमा महान् है। हे (आदित्य) = आदान करनेवाले सूर्य! उदय होते ही समन्तात् कृमियों का छेदन-भेदन [दाप् लवणे] करनेवाले सूर्य! [उद्यन्नादित्य क्रिमीन् हन्ति]। (त्वं महान् असि) = तू महान् है।
Essence
हम सूर्य की भाँति निरन्तर सरणशील, गतिशील, कर्त्तव्यकर्म-तत्पर बनकर तथा अच्छाइयों का आदान करते हुए [आदानात्] व बुराइयों का छेदन-भेदन करते हुए 'सूर्य व आदित्य' बनें और इसप्रकार महनीय जीवनवाले हों।
Subject
महान्