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Atharvaveda - Mantra 28

Atharvaveda 13/2/28

4 Sukta
46 Mantra
13/2/28
Devata- रोहितः, आदित्यः, अध्यात्मम् Rishi- ब्रह्मा Chhanda- त्रिष्टुप् Suktam- अध्यात्म सूक्त
Mantra with Swara
अत॑न्द्रो या॒स्यन्ह॒रितो॒ यदास्था॒द्द्वे रू॒पे कृ॑णुते॒ रोच॑मानः। के॑तु॒मानु॒द्यन्त्सह॑मानो॒ रजां॑सि॒ विश्वा॑ आदित्य प्र॒वतो॒ वि भा॑सि ॥

अत॑न्द्र: । या॒स्यन् । ह॒रित॑: । यत् । आ॒ऽअस्था॑त् । द्वे इति॑ । रू॒पे इति॑ । कृ॒णु॒ते॒ । रोच॑मान: । के॒तु॒ऽमान् । उ॒त्ऽयन् । सह॑मान: । रजां॑सि। विश्वा॑: । आ॒द‍ि॒त्य॒: । प्र॒ऽवत॑:। वि । भा॒सि॒॥२.२८॥

Mantra without Swara
अतन्द्रो यास्यन्हरितो यदास्थाद्द्वे रूपे कृणुते रोचमानः। केतुमानुद्यन्त्सहमानो रजांसि विश्वा आदित्य प्रवतो वि भासि ॥

अतन्द्र: । यास्यन् । हरित: । यत् । आऽअस्थात् । द्वे इति । रूपे इति । कृणुते । रोचमान: । केतुऽमान् । उत्ऽयन् । सहमान: । रजांसि। विश्वा: । आद‍ित्य: । प्रऽवत:। वि । भासि॥२.२८॥

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Meaning
१.हे (आदित्य) = किरणों द्वारा जलों का आदान करनेवाले सूर्य! (यदा) = जब (अतन्द्रः यास्यन्) = तन्द्रा से रहित होकर गति की इच्छावाले आप (हरित: आस्थात्) = इन किरणरूप अश्वों पर अधिष्ठित होते हो तब (रोचमान:) = देदीप्यमान होते हुए आप (द्वे रूपे कृणुते) = दिन व रात्रि के दो रूपों को प्रकट करते हो। २. (केतुमान) = प्रकाश की किरणोंवाले (उद्यन्) = उदय होते हुए (विश्वा एनांसि सहमानः) = [रजस् Gloom, darkness] सब अन्धकारों को कुचलते हुए आप (प्रवत: विभासि) = [Delight, elevation] सब उच्च स्थानों को दीस करनेवाले होते हैं। उदय होते हुए सूर्य का प्रकाश सर्वप्रथम पर्वत शिखरादि उच्च स्थानों को ही प्रकाशमय करता है।
Essence
सूर्य में तन्द्रा का नितान्त अभाव है। यह प्रकाशमय किरणों का अधिष्ठाता है। दिन व रात्रि का निर्माण करता हुआ यह उदित होता है तो अन्धकार का पराभव करके प्रारम्भ में ही शिखरों को दीस करनेवाला होता है। सूर्य की भाँति हमें भी तन्द्राशून्य गतिवाला बनना |
Subject
अतन्द्रः यास्यन्